तुलसी - हाईस्कूल - कोर्स | Tulasi - Haiskul - Kors

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Tulasi - Haiskul - Kors by हरिशंकर शर्मा - Harishankar Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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६ २३) अध्ययन श्निवायें है । परन्तु इस बात को फौन नहीं ज्ञानता कि रामचन्द्रजी मे वन में रद कर 'वेसरोसामानी! की हालत में, वद काम किया जिसे बडे बड़े सत्ताधारी सप्नाद भी न कर सफे थे । राप्तसराज्ञ रावण का वध करना फोई साधा- रण बात न थी, परन्तु वनवास फी दालत में उन्होंने उसे ही कर दिखाया । रामचन्द्र शान्ति और गस्भीरता की समूतति थे, उनमें सचाई कूट-कूट कर भरी थी, ये सदेय धम की रक्ता में प्रदुत्त रदते थे, धर्म भी उनकी रध्ता करता था | एक ओर सकल साधन सम्पन्न लफापति रावण श्र दूसरी तरफ तापस घेशधारी बन-घन भटकने वाले विपन्न राम | कितना विकट बैपस्य श्र फैसा प्रतिकूल प्रसण था। परन्तु राम को इन बातों की क्या चिन्ता थी, चह परिस्थिति के दास नहीं बल्कि उसके निर्माता और उत्पादक थे ) परिणाम यद्द द्वीता है कि विभीपण अपने 'अन्यायी साई रावण से अखसदयोग कर राम का साथ देता है श्रीए उनका आजन्म भक्त बन्र ज़ाता है मायति हर सीता 7 ल#पडे? सती-घाध्पी स्लरीता का बिमल चरित्र, ससार भर की स्त्रियों फे लिए आदर्श ओर श्रद्ुक्णीप दै । चहुतेणा समभाया-बुकाया जाता है, घन की भयड्डभरता दिखाई जाती है आर परिस्थिति की प्रतिकूलता का दिग्द्शन कराया आता है, परन्तु सती सीता प्राणपति का साथ क्‍य छोडने वाली है, चह ऐसे सकट-फाल में मदलों में रह कर आनन्द फा जीवन व्यतीत करना क्यों पसनन्‍्द्‌ फरने लगीं। सीता ने कटी लोक-लज्जा पर लात मारकर सब से साफ-साफ कद दिया- “में प्राशनाथ के बिना पक क्षण भी नहों रद सकती । मेरे लिए तो राम के बिना भोग रोग के-समान द्वो जायमगे, भूषण ज््र्0 ट्ष्डी




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