श्री शिव संहिता | Shri Siv Samhita

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Shri Siv Samhita by खेमराज श्रीकृष्णदास - Khemraj Shrikrashnadas

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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२2 उसमें काठका नियम हे इस हेतुप्ते आत्मा सवंथा निश्चय रेपण है ॥ ५८ व त्मकैः। तस्मादात्मा भवेश्रित्यस्त न भवेत्खलु ॥ ५९॥ टीका-यह जो भिथ्या पंचभूत हैं इनसे उसका नाश नहीं है इस कारणसे आत्मा नित्य है ओर यह निश्चय है कि उसका कभी नाश नहीं होता ॥ ५९ ॥ मूलप्न >> यो नास्तहित तस्मादेकी$+ का-जब दूसरा कुछ नहीं है तो एक वहीं स्वदा अंद्वेत हे जब उसके सिवाय अथात्‌ उससे अन्य सब मिथ्या है तो वही एक शुद्ध आत्मा सत्य है ॥ ६० ॥ मूलम-अविद्याभूते संसारे दुखनाशे सुख॑ यतः ॥ ज्ञानादायंतशून्य॑ स्ात्तस्मा- दात्मा भवृत्सुखस ॥ ६१ ॥ टीका-यह संसार अविश्यासे उत्पन्न भया है इस- में दुःखंका नाश होनेपर सुर्छ होता है ओर ज्ञान




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