श्री मद्वाल्मीकि - रामायण अयोध्याकाण्ड उत्तरार्द्ध | Shrimadvalmiki Ramayan Ayodhyakand Uttarardh

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Shrimadvalmiki Ramayan Ayodhyakand Uttarardh  by चतुर्वेदी द्वारिकाप्रसाद शर्मा - chaturvedi dwarikaprasad sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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चतुःपद्चाश. सर्ग: ५5७ धन्विनौ तो सुर गत्वा सम्पमाने दिवाकरे | गद्जायमुनयो: सन्‍्धौर आपतर्नितय झनेः ॥प्या इस शअ्रकार आपमघ्र म वातचात्त करते हुए दोनीं घनधारी माई सुथ' के छिपते-छिपते स्गम पर स्थित भरद्वाज जी के आश्रम से पहुँचे ॥ ८ ॥ रामस्त्वाश्रममामाद्य त्रासयन्‌ संगपतियः। छह हि ग़त्ा महृतमघ्वानं भरदाजमुपागमत्‌ ॥&॥ आश्चम में दो धनुद्ध रो को आते देस, आत्रमवासी पशु पत्ती भयभीत हुए | इतने ही में श्रीरामचन्द्र जी एक मुहृत्त' चल कर, भरद्वाज जी की ( कुटी के ) पास पहुँच गए ॥ ६ ॥। ततस्त्वाश्रममामाध म्नेदर्शनकाडूविणौ । सीतयाज्लुगतों बीरों दूरादेवायतस्थतुः ॥१०॥ चदनन्वर सीता सहित दोना बोर भरद्ाज जो ऊन दर्शन करने की अभिलापा स, कुटा स छुछ दूर रूक गए। ( रुफन या कारण मूपण टीशाकार ने यह बतलाया है. कि सम्ध्या वा समग्र था। अतः उस समय ऋषिप्रधर अग्निहोत्न फर रह थे । कहीं उनके काय में विप्न न पड़े, अतः कुछ देर वे ठहर गए, किन्तु जब अनुमति मित्र गई तव ) ॥ १०॥ स प्रविश्य महात्मानमपिं शिप्यगणेट् तम | २संशितवत्तमेका्य तपसा रूब्धचश्षुपत््‌ ॥१ ६॥ - र्रम्घौ- सुझ्मे बरमान 1 २ उशिततव-झवौदएह्रत । (गो)




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