गणदेवता | Ganadevata

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Ganadevata by ताराशंकर वंद्योपाध्याय - Tarashankar Vandhyopadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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डाहकर पराये पुखखी मछलिया पकडकर अपना तालाब भर लेता। अपने धरकी दीवारको हर साल वरसातम खुद कुदालू चलाकर गिरा देता और नयी दीवार उठाते बवत दुसरेकी थोटी-्सी जमीन या रास्ता दवा लछेता। उससे ज्यादा कुछ वोल्चाल कोई नही करता, लेकिन किसी खास आदमीकी जमीन दवा ऐता तो प्रतिवाद क्ये त्रिना उपाय नहीं था। ऐस॑में छिझः कुदाल तानवर डट जाता | बिना दाँतवाले मुँहसे जाने बया बोलता वि समझमें नहीं आता | लगता कि कोई पशु गरज रहा हू । महज ४४ सालकी उमरमें हो उसके दात जाते रहे, योत-व्यापिसे सार दात गिर गये । हरिजतांके टोल़ेम जब॑ सारी मरद सूरतें शराबके नशेमे चूर हाती, ता बह दवे पावो वह शिकवारवी टोहमे पठता । बहुत वार लोगाने उसका पीछा किया मगर बह निश्चाचर हिंसक' पशु-सा दौड लगाता । यह रहा श्रीहरि घाप उफ छठिछ पाल या छिख मण्डल । अनिरद्ध छिलका खूर पहचानता था, फ्रि भी पत्नीवी बातवा विचार करना तो दूर, उसे ठेलकर हटाते हुए बाहर रास्तेपर उतर पडा । पद्म बुद्धि- भरती थी। उसने न तो गुस्सा क्या, न मान। फिर आवाज़ दी, “बजी भो, सुना सुनो, छोटा ।” घूव धोमेसे हेसकर कहा, “पीछस रोक रही हूँ, सुनो |” अबबी छेह हुए गेंहुअन-सा अनिरुद्ध विगडकर पलटा । पटमने हेसकर कहा “थाटा-सा पानी पी छो, तव जाओ ।” छोटबर अनिरुद्धनें जारस उसके गारुपर एक तमाचा जड़ दिया--/और टोकेगी पीछेसे २! पदमका माथा सनझना उठा। हछाहा पीटनेयाछा हाथ अनिरुद्धका--वह चोद बडी कठित था। 'वाप रे' कहती हुई हथेलीसे मुँह ढेंसकर पदम बठ गयी । अब जनिरुद्ध अप्रतिभ हा गया। साथ हो उसे झरा डर भी लगा । जहा तहाँ तमाचा पड जानेस ता लाग मर भी जाते है | घवरावर उसने आवाज़ दी, “'पदम, पहम बहू पदमका शरार थरथर काँप रहा था, वह्‌ फ४7-फफक्कर रो रही थी। अनिरद्ध वारा, यह छे वाबा, ऐे, कुरता उतार देता हूँ, अब थाना नही जाऊँगा। उठ | रो मत ऐ पदम !” मुँह ढक उसके हायका सोचते हुए कहा, पंदम ! पदमने मुँडपर म हाय हटा ल्यि और खिल्फिलाऊर हँस परी । मुँह देगकर बह रा नहों रहा यो, चुपचाप हंस रही थी । पदमम गज़वकी तावत थी और फिर अनिरद्धका तमाचा मक्का खानेसे आदी भी हो चुबो थी। एक तमाचम गया हाना था उसका ऐक्नि अनिरठ्धक पौष्यपका झायद चाट छगी--वह गुम-मुम हो गया। पदुम थोटान्सा गुड और एक बहुत बड़े कटारमें फरवी तथा एवं लाठा पानी छावर चण्डीमण्डप १३




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