समता पर्युषण पर्वाराधना | Samta Paryushan Parvaradhan

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Samta Paryushan Parvaradhan by सज्जनसिंह मेहता - Sajjansingh Mehta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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आगार धर्म के अनुसार गृहस्थ जीवन में रहता हुआ श्रावक बारह अणुव्रतों का पालन करता है तथा जो भव्य प्राणी संसार का त्याग कर पाँच महाव्रत, आठ प्रवचन माता का पूर्ण रूपेण पालन करते हैं वे अणगार धर्म को जीवन में अपनाते हैं | आगार धर्म अणगार धर्म की अपेक्षा सरल एवं आसान है | अणगार धर्म अत्यन्त दुष्कर, कठिन एवं तलवार की धार पर चलने से भी अधिक कठिन है | इस प्रकार पर्युषण पर्व के प्रथम दिवस पर यह चिन्तन-मनन करें कि धर्म व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग बने | धर्म के द्वारा ही इहलोक और परलोक सुधारा जा सकता है । प्रभु-प्रार्थना भी धर्म क्रिया का आवश्यक अंग है | प्रार्थना की कड़ियों में कवि ने भी यही कहा है कि यह प्रार्थना संसार सागर से तिराने वाली है | इस पावन अवसर पर हम धर्म के महत्व को समझें, अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य के अनुसार जीवन में उतारें, प्रभु की शरण ग्रहण करें तथा मोक्ष मार्ग पर अग्रसर हों | ज्ञानियों का कथन है- धर्म में प्रवृत्ति करो, प्रतिक्षण प्रभु को स्मरण करो | किसी कवि ने भी कहा है- साँस साँस पर हरि भजो, वृथा साँस मत खोय | ना जाने या साँस को, आवत होय न होय | यदि आप वर्ष भर धार्मिक अनुष्ठान न करे सकें तो कम से कम इन आठ दिवस में तो धर्म का पुरुषार्थ करें | पद्म प्रभु की पावन प्रार्थना के माध्यम से संसार परित करने का प्रयत्न करें | बस नमोईईन्तो ऋषभो वा, 38 ऋषभं पवित्नम्‌ | भावार्थ- अरिहन्त (अर्हन्त) ऋषभदेव को नमस्कार है, वे पवित्र हैं | (यजुर्वेद अ-25 मन्त्र 16) समता पर्युषण पर्वाराधना ५




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