उत्तराध्ययनसूत्र | Uttaradhyayana Sutra
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
16 MB
कुल पष्ठ :
611
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)न अध्ययन /२३
है। कपायपाहुड** की जयधवला टीका में तथा भोम्मरसार** में क्रमशः गुणधर आचार्य ने और सिद्धान्त-
चक्रवर्ती नेमिचन्द्र ने अंगवाह्य के चौदह प्रकार यत्ताये हैं । उनमें सातवां दशवैकालिक है और आठवाँ उत्तराध्ययन
है। नन्दीसूत्र में आचार्य देववाचक ने अंगवाह्म द्रुत के दो विभाग किये हैं ९१ उनमें एक कालिक और दूसरा
उत्कालिक है। कालिक सूत्रों की परिगणना में उत्तराध्ययन का प्रथम स्थान है और उत्कालिक सूत्रों की परिगणना
में दशवैकालिक का प्रथम स्थान है।
सामान्यरूप से मूलसूत्रों की संख्या चार है। मूलसूत्रों कौ संख्या के सम्बन्ध में विज्ञों के विभिन्न मत हम
पूर्ष थता चुके हैं। चाहे संख्या के सम्बन्ध में कितने हो मतभेद हों, पर सभो मनीषियों ने उत्तराध्ययन को
'मूलसूत्र माना है।
उत्तराध्ययन' में दो शब्द हैं- उत्तर और अध्ययन। समथधायांग में 'छत्तीसे उत्तरण्झयणाईं' यह वाक्य
मिलता है (१ प्रस्तुत वाक्य में उत्तराध्ययन के छत्तीस अध्ययनों का प्रतिपादन नहीं किन्तु छत्तीस उत्तर अध्ययन
प्रतिपादित किये गये हैं। नन््दीसूत्र में “उत्तरण्मयणाणि” यह बहुबचनात्मक नाम प्राप्त है।*३ उत्तराध्ययन के
अन्तिम अध्ययन की अन्तिम गाथा में “छत्तोसं उत्तरण्झाए” इस प्रकार बहुवचनात्मक नाम मिलता है।*४
उत्तराध्ययननियुक्ति में भी उत्तराध्ययन का नाम बहुवचन में प्रयोग किया गया है ।*५ उत्तरध्ययनचूर्णि में छत्तीस
उत्तराध्ययनों का एक श्रुतस्कंध माना है ।*६ तथापि उसका नाम चूर्णिकार ने बहुवचनात्मक माना है। यहुवचनात्मक
नाम से यह विदित है कि उत्तराध्ययन अध्ययनों का एक योग भात्र है। यह एककर्तुक एक ग्रन्थ नहीं है।
उत्तर शब्द पूर्व की अपेक्षा से है। जिनदासगणी महत्तर ने इन अध्ययनों की तीन प्रकार से योजना की है--
(१) स-उत्तर +-+ पहला अध्ययन
(२) निरुत्तर “-- छत्तीसवां अध्ययन
(३) स-उत्तर-निरुत्र --- बीच के सारे अध्ययन
परन्तु उत्तर शब्द की प्रस्तुत अर्थयोजना जिनदासगणी महत्तर की दृष्टि से अधिकृत नहीं है।*० जे
निर्मुक्तिकार भद्गवाहु के द्वारा जो अर्थ दिया था है, उसे प्रामाणिक मानते हैं। निर्युक्ति की दृष्टि से यह अध्ययन
आचारंग के उत्तरकाल में पढ़े जाते थे, इसीलिए इस आगम को 'उत्तर अध्ययन' कहा है [९८ उत्तराध्ययनचूर्णि
व उत्तराध्ययन-बृहदवृत्ति में भी प्रस्तुत कथन का समर्थन है। श्रुवकेवली आचार्य शय्यम्भव के पश्चात् यह अध्ययन
१९. दसवेयालिये उत्तरण्झय्णं। ---कपायपाहुड (जयघवला सहित) भाग १, पृष्ठ १३२५
२०. दसवेयालं च॒ उत्तरण्ञयर्ण। --गोम्मटप्ता: (जीवकाण्ड), गाथा ३६७
२१. से किं त॑ कालियं? कालियं अणेगविहं पण्णत्तें, तं जहा--उत्तरण्झयणाईं *० | से कि त॑ उक्कालियं? उक्कालिय अगेगविहं
चणत्त तंजहा--दसवेयालिया ...1 --- नंदीसूत्र ४३
२२. समवायांग, समवाय ३६. २३. नन्दीसूब ड३
२४, उत्तराध्यवव ३६/२६८ २५. उत्तराध्ययनियुक्ति, गा.ढ पृ.२१, पा. टि. ४
२६. 'एतेसिं चेव छत्तीसाए उत्तरज्झयणाणं समुदयसमितिस्तमाणमेण॑ उत्तरज्प्यणभावसुत्तयंथे त्ति लब्भइ, ताणि भुण छत्तीसं
'उत्तरण्झयणाणि इमेहिं नामेहिं अणुगंतव्वाणि। ---उच्तमध्ययवचूर्णि, पृष्ठ ८
२७. विणसुययं सउत्तरं जीवाजीवाभिगमो णिरुत्तरो, सर्बोचर इत्यर्थ; सेसज्यणाणि सउत्तराणि णिरत्तराणि, य, कहं? परीसहा
विणयसुयस्स उत्तरा चउरंगिम्पस्स तु पुव्या इति काउं णिरुत्तं। ---उत्रध्ययनचूर्षि, पृष्ठ ६
२८. कमउत्तेण पगय॑ आयासस्सेव उवरिमाईं तु।
तम्हां उ उत्तर खलु अज्झयणा छुंति णायव्वा ॥ ---उत्तराध्ययननियुक्ति, गा. ३
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