विचार - विज्ञान | Vichar - Vigyan

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Vichar - Vigyan by डॉ हरद्वारी लाल शर्मा - Dr. Hardwari Lal Sharma

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( रे ) और भोजन आदि का प्रबंध दो दिन तक के लिए करना है। . वे लोग मेरे संभ्रान्त अतिथि हैं । उन पर मैं यह प्रभाव उत्पन्न करना चाहता हूँ कि में एकं संपन्न चतुर और अतिंथि-सत्कार में कुशल मित्र हूँ । साथ ही व्यय भी अधिक न हो । कुछ थोड़ा सामान खरीदना पड़े । बैठक और दूसरे कमरों को सजाने के लिए कम से कम वस्तुएँ लानी पढ़ें इत्यादि ।. इस प्रकार अपनी समस्या की चस्तु-स्थिति को सबसे पहले समझने का प्रयल किया ओर इस स्थिति के आधार पर ही इसकां सुलकाव किया । इस प्रकार की कठपना को हम रचनात्मक कर्पना या विचार कहेंगे। यहाँ यह स्पष्ट हो गया होगा कि बुद्धि में अ्ररन के उपस्थित होने पर विचार का प्रारंभ होता है । यदि प्रश्न का सुलकाव प्रत्यक्ष स्खति अथवा कंर्पना के झाघार पर हो जाय तो विचार. स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं होता 1? यंदि परिस्थितियों को ठीक समककर उन्हीं के अनुसार सुलकाव किया जाये तो बुद्धि की गति संयत होगी । इसी क्रिया का नाम विचार है । यदि हम ध्यान से देखें तो प्रतीत होगा किं हम बहुत बार अनेक प्रश्नों का. उत्तर विचार के- बल से देते हैं । मेरा छाता कहाँ है ? इस मास .में व्यय किस प्रकार किया जाय कि कुछ रुपया बंच जाय ? इस स्थान में -केसा सकान बनाया जाय कि स्वस्थ सुखप्रद्‌ और पर्याप्त हो सके ? आदि-आदि । यदि इन प्रश्नों का उत्तर स्ति आदि पर आश्रित हो तो सरलता तो अवश्य हो जाती है परन्तु विचार- शंक्ति से काम नहीं लिया जाता । मनुष्य ने विचार-शंक्ति को इतना प्रबल और विकसित बना लिया है कि उसने अनेकों ऐसे प्रश्नों का सुलकाव खोज डाला जो उसकी दैनिक आवश्ये+ कताओं से संबंध नहीं रखते और जिनका सुलभाव विचार के अतिरिक्त और किंसी प्रकार संभव नहीं । जैसे--ये आकाश के प्रकाश-पिण्ड क्या हैं ? कयां इनकी गति नियम के अनुसार है और वह नियम कौन-सा है ? ऋतुआओं को नियम के अनुसार परिंवतंन दिन-रात का आआना-जाना समुद्रों की धारा पवतों सीलों का बनना भूकंप का होना समाज का विकास राष्ट्रों का उत्थान और पतन आदिं किंतने प्रश्न हैं जिनके विषय में सनुप्य ने विचार किया है झर उनको यथों चित रूप से समझने का प्रयत्न किया है ? प्रक्धति के अनन्त




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