108 उपनिषद | 108 Upanishad

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ९३ ) करना, सभाओं में भाषण देना, असत्य बोलना निषिद्ध हे । व्यवसाय वाशिज्य आदि कम न करे । शिष्य एकत्रित न करे। विभिन्न आयोजनों द्वारा अपनी प्रसिद्धि न बढ़ाबे । वेदों का ज्ञाता हो तो भी गो के समान निरहंकार रहे, दूसरों के द्वारा मिला हुआ आदर तपोपाजंन में हानिमप्रद है । किसी अनुचित कार्य द्वारा सन्‍्यास धर्म को कल्ंकित न करे । सदा अपने आश्रम के अनुकूल आचरण करे । कभी किसी पद्‌ की कामना न करे | आत्मा की ही उपासना करे किसी अन्य देवता की नहीं । देवोत्सव अथवा मेले आदि में भाग नलें | परिचित स्थान के उपयोग से दूर रहे । सभा स्थल्ष को श्मसान के समान समझे । घन सम्पत्ति को कालकूट विष के समान माने ।”? --नारद परिंब्राजकोपनिषद उसका आहार कितना कैसा और कहाँ से प्राप्त हो इसकी परम्पर्सी इस प्रकार हेः--- “स्ोजन को औषधि की दृष्टि से अर्थात्‌ केवल प्राण रक्षा के लिए लेवे । आह्यर ऐसा ले जिससे चर्बी न बढ़े | शरीर दुबला दी रहे ।' ***** एक ही स्थान से भिक्षा न करे चाहे वह बृहस्पति के समान ही पूज्य क्यों न हो ।'*''''सन्यासी के लिए घी कुत्ते के मृत्र के समान है, शहद शराब के तुल्य है । चेल शूकर के मूत्र के समान है । दूध नर मूत्र के समान है । इसलिए उसे सदेव धुत आदि रहित भोजन ही प्रयत्नपूवक महणु करना चाहिए । घी आदि के पकवान कभी न खाय । *'*** घी' की रुधिर के समान, एकत्र किये हुए अन्न को मांस के संमान त्याग दे । गंध लेपन को गंदी वस्तु के समान, हंसी सजाकं और घमंड को' गो मांस के समान, परेचित घर की भिक्षा को चाण्डाल के




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