पराग | Parag

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Parag by रूपनारायण पाण्डेय - Roopnarayan Pandey

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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दिग्दशन हिंदू-धर्-महत्तत हृदय में अकित होगा। उससे अपना नाम कमी न कलकित होगा। भारत में चारों तरफ लाखो तौर्थ-स्थान हैं, जिनमे होते नित्य ही जप, तप, पूता, दान हैं। (१८) खोदी जाती भूमि जहाँ, उस जगह तुम्हारे याग-नयूप या योग-रूप ही मिलते सारे। नदियों में भी आज फूल चदन से चर्चित बहते हैं | हर घड़ी रहे प्रतिमा भी आर्चित। यहीं पहाड़ों पर मिलें योगी लोग कही-कही | घन्य अनन्य गिशिप यह अन्य देश में है नहीं। (२०) जैसे देखो, और जिधर देखो भारत में , धर्म-मायना यहाँ मिलेगी सपकके मत में। धर्म-कर्म की भूमि इसी से इसको कहते ; इसमें है अपत्तार ईश के होते रहते। उन्नति होनी हे नहीं धर्म छोड़कर देश की 3 शप-मेत्रा के तुल्य हे नाहक नकल विदेश की। (२१) धर्मयान के रिना त्याय हो नहीं सकेगा धर्म-भाय से हीन सभी में स्वार्थ तकेगा। 4 अश




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