न्यायावतारवार्तिक - वृत्ति | Nyayavataravartika - vritti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कलकचत्ानिवासी साधुचरित-पश्रेष्ठिवय श्रीमद्‌ डालचन्दजी सिंघी पृण्यस्मृतिनिमित्प्रतिष्ठापित एवं प्रकाशित[ जैन भागमिक, दार्शनिक, साहिलिक, ऐतिहासिक, वैज्ञानिक, कथातव्मक - इत्यादि विविधविषयगुम्फित ; प्राकृत, संस्कृत, अपकन्रंश, आचीनगूजर-राजस्थानी आदि नानाभाषानिबद्ध ; सार्वजनीन पुरातन बाझाय तथा नूतन संशोधनात्मक साहित्य प्रकाशिनी सर्वश्रेष्ठ जन अन्थावलि, ]अतिष्ठाता भरीमदू-डाल्चन्दजी-सिधीसत्पुत्र ख्॒० दानशील -साहित्यरसिक - संस्कृतिप्रियश्री बहादुर सिंहजी सिंधी््च्च्ल्प्जीि2ल्तय 55 ग्रधान-संम्पादक तथा संचालकआचाये जिन विजय मुनि (सम्मान्य नियामक - भारतीय विद्या भवन-बं ब ६)सर्वेधेव संरक्षकश्री राजे छू सिंहजी सिंघी तथां श्री न रे नद्र सिंह जी सिधीप्कादानकतोंसिंची जनशाख्र शिक्षापीठभारतीय विद्या भवन 1बदइ एफी/० नी सार (/रपििका जिनकी करियर नीली पी की परी सर न्‍ऑपिलीजरी जी री जी जी की विन जी जडी जीप .री सती री परी जरी बरी जी जार ा१ि पीधैफाशक-जयन्तकृष्ण ह, दवे, ऑनररी रजिस्ट्रार, भारतीय विद्या भवन, चोपादी रोड, बंबई ७, मु रक-रामचंद येस्‌ शेडगे, निगेयसागर प्रेस, २६-१८, कोलभाद स्ट्रीउ, कालबादेवी, बंबई .२




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