आशौचपन्जिका | Aashauchapanjika

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Aashochpanjika by सुरजनदास स्वामी - Surjandas Swami

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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॥ भरी: ॥ निवेदन * शा कुछ ही दिन हुए अर्थात्‌ त० २४-१२-४१ ई० को “प्राणोत्पत्ति प्रसज्ग” पुस्तक के द्वितीयावृत्ति के आरम्भ में निवेदन शीषक छ्लेख में बहुत कुछ लिख चुका हूँ। कादस्विनी तथा आशौचपजञ्जिका की श्थमावृत्ति जो क्रमशःवि० सं० १६७६ वि*्सं० १६७४ सें प्रकाशित हुए थे उनके समाप्त हो जाने पर इन परम उपयोगी पुस्तकों को जब बहुत्र मांग होने लगी तब वि० सं० १६६६ में इनके श्रद्माशन का आयोजन कर काद्म्बिनी की 'दवित्ीकावृलि तो हिन्दीभाषानुवाद्सहित प्रकाशित करा दी। परन्तु आवश्यक होते हुए भी आशोचपश्चिका की द्वितीयावृत्ति उस समय हम न करा सके । आज्ञ ठोक १० वर्ष बाद उसी आशोचपश्चिका को द्वितीयाचत्ति बहुत समय से प्रतीक्षा करने वाले पाठकों तथा अन्य बिद्यानुरागी महानुभावों के समक्ष उपस्थित कर रहे हैं । : कक्क प्रभ्थ का यद्यपि अक्षरशः हिन्दी वभाषानुबाद तो नहीं हुआ है क्योंकि उप्तको आवश्यकता भी श्रतीत नहीं होती है। परन्तु इसके विषयों को भत्नी प्रकार समभने के ज़िये हिन्दी भाषा में इसका सारांश स्वामी सुरजनद।/सजी एम? ए० ने बड़े ही परिश्रम से इस प्रकार विस्पष्ट व्िया है कि हिन्दीमाषाभाषी इसके प्रत्येक विषय को करतंत्ञामज्ञकबत्‌ समझ सकेगे | इस प्रकार प्रन्थों के भाषानुवाद या सारांश आदि से उसकी उपयोगिता तो वास्ट्च में बहुत बढ़ जाती है अर्थात्‌ संस्कृत के विद्वानों के अतिरिक्त विद्या प्रेमी हिन्दी भा में विशेष रुचि रखने वाले भी इससे पूरा लाग उठा सकते हैं जिनको गणाना भी संप्रति संस्कृत ज्ञाननेवालों से अधिक है परन्तु हम पहले भी अन्य पुस्तकों में यह निवेदत कर चुके हैं कि इससे हमारे मुख्य दह श्य ( अमुद्वित ग्रन्थों के प्रकाशन राय ) में बहुन शिथिक्षता आजाने से बड़ी बाधा उपस्थित हो आातो है और हाय क्षेत्र को बढ़ाने का साधन हमको नहीं है । अतः हम तो सर्वेप्रथम अपने उद्देश्य को ही जहां 4क हमारे जीवन काक्न में हो सके पूरा करने का विचार रखते हैं. |




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