अष्टावक्र गीता भाषा टीका सहित | Astavkra Gita Bhasha Tika Sahit

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Astavkra  Gita Bhasha Tika Sahit by रायबहादुर बाबू जालिमसिंह - Rai Bahadur Babu Zalim Singh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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रेरे अष्टाचक्-गीता भा० दी० स॒० मूलम्‌ | के + बच्न विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्‌। आनन्दपरमानन्दः स चोधस्त्व सु चर ॥१०॥ पदच्छेद' । यंत्र, विश्वम्‌, इदम्‌, भाति, कल्पितम्‌, रज्जुसपत्रतू, आननन्‍द- परमानन्द:, सः, भोध', त्वम्‌, सुखम्‌, चर ॥| छ अन्बयः । शब्दार्थ | | अन्धयः । शब्दार्थ । अन्नूजिसमें 2 ऐ इद्मूल्यः परमानता ) झधानन्दपरमानन्द्‌ कल्प न्कािपत बट लपतम्‌>कहि * बोध-स्वोधखूप जिश्वमूरसंसार का रज्जुसपंवत्‌ररण्णु में सपप के सदश स्वमूट्यू ६(पतपद लू ) भात्तिज्भाखता रहता हैं सुखमू-सुखपू्वक सःल्वद्दी रजविचर आ भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि है राजन्‌ ! जिस अल्य-झात्मा में यह / जगत रज्जु में सप की तरद कह्पित ग्रवीत होता है, बद आत्मा आनन्द-स्वरूप है | जैसे रज्जु के अज्ञान करके, मंद अंधकार में ,रज्जु ही सर्प रूप प्रतीत होती हैं, या रज्जु में सर्प प्रतीत होता हैं । वास्तव में न ती रज्जु सर्प-रूप है और न रुज्जु में सर्प है। और न * रजजु में सर्प पूर्व था और न आगे होवेगा और न वर्तमान काल में है, किन्तु रज्जु के अज्ञान करके और मन्द अन्धकार झादिं सहकारी कारणों द्वारा पुरुष को शान्ति से रुज्जु में सर्प अतीत होता है, और




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