शरतचन्द्र व्यक्ति और साहित्यकार | Shart Chandr Vayakti Aur Unka Sahitya

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Shart Chandr Vayakti Aur Unka Sahitya by मन्मथनाथ गुप्त - Manmathnath Gupta

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ऋषपक्रमलिका ९ जिकता। 'नम-बाबू-विप्नास' (१८२१) 'भालतासेर घरेर दुसाक्त' (१८५७) श्लुतोम प्यॉंचार सकझ्मा' (१८६२) भादि पुस्तकों को भाज बँगाल में कोई भौ महीं पढ़ता पर इसमें रुम्देह सहीं कि चाहे बे कितनी भी प्रक्षम रचनाएँ हों तो भी बंकिम रसेप्ा बी रचनाप्ों की झग्रगामिसी थी । जिस मापा का यध परिपष्वता प्राप्त कर चुका हो ठपा जिसमें एक स्टैंडड या मानदंड कायम हो चुका हो उसमें रचना करना तुप्तनाएमक रुप से आझासाम है पर उस समय बंगला में कोई गद्य गहीं घा। उसमें गण भी बनाते जाना भौर साथ ही साथ लिखना बैसा ही कठिन प्रमास था बैसे किसी सखक का कागछ बनाकर तब उस पर सिरूना पड़े बल्कि इससे भी कटित भा। इस भगीरण प्रयास में बकिस से पूर्ब-युण के संखक्रों की प्रतिमा का अ्रभिकांप्त माम यद्धि नप्ट हो सया तो संमृक्त साभना बिफस हो गई, एसी बात नहीं बंकिम में जाकर उन्हीं की दकी हुई साववा सफलता के एवर्ध-मुकूट से मह्ित हुई । केदस गद्य निर्मास की दुप्टि स गही बंगला साहित्य को क्लासिक से रोमाचिक युग में स जान की दृष्टि से मी व लेखक डकिंग के श्रप्रदूत पे | भाषा दा भाव के क्षेत्र म दी हांत हुए भी थे उपध्यास किसी घाहित्य क प्राईम्मिर उपम्या्सों स शिवप्ट नहीं थ । बेंगणा के प्रथम सफल उपस्यासकार बंकिमचरद्र थे इसी शैसियत से डरहोने प्शित्त भारतीय स्याति प्राप्त की | के मुक्यत ऐतिहासि' ठप श्यासकार ही समफ्ले जात हैं बयाद्ि उसके प्रशिकांप उपस्पाों म कुछ ह बुछ ऐतिहासिक स्यक्षित पाक-पात्री रूप में हैं, पर स्मरण रहति प्रपने उपस्पासों में केबल्न दा-बार ऐतिहासिक स्पक्तियों ढग पात्र बना कर पड़ा कर देसे से हो कोई ऐशिहासिक उपस्यासकार नहीं हा समता । उसके लिए सबसे प्रावध्यक बात है कि उस समय ढ& बाताइरभ डी सृष्टि कौ जाय भाहे एक भौ पाञ्र इतिट्वासप्रसिद्ध स्पवित मे का ह पक ता मृषालिती दुर्मेशवस्दिनी चखपेला एविश्वसिक उपस्यास महीं कहा जा ऐतिहासिक उपस्पास हां गया है रक्ति अर्थ. 1 हो। इस बृप्टि स श्भ्रा दपासनुष्दस




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