श्रीयोगवासिष्ठ | Shri Yoog Vasisth

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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वासिएछ- ] तीथयात्रा १९ रामजीनें कहा, तव वसिष्ठजीपास वेंठेथे, तिननें भी दश्रथकों कहा. हे राजन्‌ ! रामजीकों आज्ञा देहु; सो तीर्थ कर आवे; जो इनका चित्त उठ्या है; ये राजक- मार है; इसकों साथ सेना दीजें, पन दीजें; मंत्री दीजें; , आाह्मण दीजें जो यह दुशैनकर आवे. हे भारद्वाज ! जब ऐसे विचार किया, तव शुभ सु- हत्त देखकर रामजीकों आज्ञा दीनी. जब चलने लगे, तव पिता अरु माताके चरण लगे; अरु सबकों कंठ ल- गाई रुदन करन लगे; तिनकी मिलकर आगे चले. फेसे चले जो लक्ष्मण आदि जो भाई हैं, ओ मंत्री ये, ति- नकों साथ छेकर, अरु वसिष्ठ आदि जो बाह्मण विधि- को जाननेवाले थे, अरु बहुत धन, सेना तिनकों साथले चले, ओ दान पुण्य करत जब णहके वाहिर निकसे, तव उहांके जो छोक थे; अरु ख्तरियां थी तिन सबनें रामजी- के उपर फूल अरु कलीकी मालकी वर्षो करी, सो कैसी वषों है, जेसे वरफ वर्षत है, अरु रामजीकी जो मूर्ति है सो हृदयमें धर लीनी; इसी प्रकार रामजी उद्दांसों चले, तहां त्राह्मण अरु निर्धनकों दान देते देते तीथे जो गंगा, यमुना, सरस्वती, आदि देखे है, तिनमें खान वि- धिसंयुक्त करके पथ्वीके चारों कोन उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिमकों दान किया; अरु चारो और समुद्वमें खान कीये; अरु सुमेरु पवेतपर गये; हिमालय पर्वतपर गये;




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