योग - शास्त्र | Yog Sastra
श्रेणी : योग / Yoga

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Add Infomation AboutAacharya Shri Hemchandra
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
8.42 MB
कुल पष्ठ :
388
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)एक परिशीलन गछमोक्ष के साथ संबंध कराने बाली क्रिया को, साधना को हो “योग”
कहते हैं ।जैन-श्रागम मे 'सवर' शब्द का प्रयोग हुश्ना है । यह जैनो का एक
विशेष पारिभाषिक दाब्द है । जैन विचारकों के श्रतिरिक्त श्रन्य किसी
भी भारतीय विचारक ने इस शब्द का प्रयोग नहीं किया है । “सवर'
शब्द घ्राध्यात्मिक साधना के झरथे मे प्रयुक्त हुआ है । पास्रव का निरोध
करने का नाम संबर है ।. महषि पत्जलि ने योग-सूत्र मे चित्त-ृत्ति
के निरोध को योग कहा है । इस तरह सवर श्रौर योग--दोनो के अथे
में 'निरोध' दाब्द का प्रयोग हुमा है । एक मे निरोध के बिदेषण के रूप
छे श्रास्व का उल्लेख किया है भ्रौर दूसरे मे चित-वृत्ति का 1जैनागम मे मिथ्यात्व, भ्रविरति, प्रसाद, कघाय, श्ौर योग को
श्रास्व कहा है ।* इसमे भी मिथ्यात्व, कषाय एव योग को प्रमुख माना
है। भ्विरति श्रौर प्रमाद--कपषाय के ही विस्तार मात्र हैं । यहाँ यह
समभ लेना चाहिए कि जनागम मे उल्लिखित श्रास्व मे जो 'योग' शब्द
झाता है, वह योग परपरा सम्मत चित्त-वृत्ति के स्थान मे है। जैनागम में
मन, वचन श्रौर कायिक प्रवृत्ति को योग कहा है । इसमे मानसिक
श्रवृत्ति तीनो का केन्द्र है। क्योकि कमं का बन्घ वचन शझ्ौर काया
की प्रवृत्ति से नही, बल्कि परिणामों से होता है 13 इस तरह योग-सुत्र
मे जिसे चित्त-वृत्ति कहा है, जैन परंपरा मे उसे श्रासव रूप योग
कहा है ।१. निरुद्धासवे (संघरो), उसराध्ययन, २९, ११; प्रास्व-निरोध' संचघर,
तस्वा्थ सुत्र, €, १ ।२. पंच झ्रासवदारा पण्णता, ते जहा--मिच्छतं, अधिरई, पसायो,
कसाया, जोगा । -संमवायांग, समदाय ५.थे. यरिलणासे अन्थ ।
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