रैदास जी की बानी | Raidas Ji Ki Bani

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ५ )'हरिजन हरिहि और ना जाने, तजे न तन त्यागी । कह रेदास सोई जन निर्मल, निसि दिन जो अनुरागी ॥३॥॥ १६ है मगती ऐसी सुनहु रे भाई। आाइ भगति तब गई बढ़ाई ॥टेका। कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे । कहा भयो जे चरन प्खारे, जॉँ लॉँ तत न. चीन्दे ॥१॥ कहा भयो जे मुँड़ मुड़ायो, कहा तीथे ब्रत कीन्हे.। _ स्वामी दास भगत झरु सेवक, परम तख नहिँ चीन्दे ॥२॥। कह रेदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावे । तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक' है चुनि खावे ॥३॥।॥ २४७ मी अब कछु मरम बिचारा हो हरि । आदि अंत औसान राम बिन, कोइ न करे निवारा हो दरि ।टेक। जब में पंक पंक* अमृत जल, जलहि खुद हो जैसे । ऐसे करम भरम जग बॉप्यो, छूटे तुम बिन कैसे हो हरि ॥१॥ जप तप बिधी निषेध नाम करूँ, पाप पुन्न दोउ माया । ऐसे माहिं तन मन गति बीमुख जनम जनम डंदकायाद हो हरि ॥र॥ ताइ़न” छेदन त्रायन' खेदन” , बहु बिधि कर ले उपाई । लोनखड़ी संजोग बिना जस, कनक कलंक न जाई हो हरी ॥३॥ भन रेदास कठिन कलि के बल, कहा उपाय अब कीजे । भव बूड़त भयभीत जगत जन, करि अवलंबन* दोले दो हरी ॥४॥ही ॥ १८ |]नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटपि ना हो । दीनानाथ दयास नरहरे ॥ टेक ॥। जनमेरँ तौही ते बिगरान । अद्दो कछु बूकें बहुरि सयान ॥१॥१ पिपीलिका--चींटी । २ कीचड़ । ३ ठगाया 1 ४ मारना । ४ कार्टना । ६ रक्षा करना | ७ शोक करना, त्याग करना । ८ नौसादर । ६ सदारा ! प्र




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