भक्तामर महाकाव्य | Bhaktamar Mahakvya

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Bhaktamar Mahakvya by पं.कमलकुमार जैन - Pt. Kamalkumar Jain

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ि हू ३] सब वसाद्ध दायक विनापि विवधाचितपादपीठ ... स्तोतु .. समुदयतमतिर्विगतत्रपोउहम्‌ । बाल विहाय _ जलसंस्थितमिन्ट्विम्ब- मन्य क इच्छति जनः सहसा ग्रहीतुम्‌ । दिन्दी पद्य स्तुति को तथ्यार हुआ हूँ में निव्‌ द्वि छोड़ के लाज | विज्ञ जनों से श्रचिंत हें प्रभ मंद चद्धि की रखना लाज ॥ जल में पढ़े चंन्द्र-मंडल को चालक बिना कोन मतिभान | सददसा उसे पकड़ने वाली प्रबलेच्छा करता गतिमान ॥ विद्वान देवताओं द्वारा जिनके मशि-मुक्ता यक्त स्वणु-सिंदा- सन की अभ्यचंना की जाती है ऐसे दे जिनेन्द्र देव भगवती सरस्वती की झनन्य अनुकंपा थिना बद्धिएकी निलेल में नि संकोच आपके श्नन्त सुण समूह. की स्तुति करने के लिए उंद्यत दो गया हूँ सो यद्द मेरी घुष्टता जल में पढ़ने चाली चल्ट्रमा की लुभावनी परछोंद्दी को पकड़ने की इच्छा करने वाले अझवोध बालक की ही भांति है । (कद ) स हों झा समो परमोदि जिणास | ( मंत्र 9 रू हों थीं थीं सिद्धेस्यो युद्धेस्प सरंसिदिदायकेन्यो नम स्वादा । ( विधि ) घद्धापूबंक सात दिन तक प्रतिदिन पघ्रिफाल १०८ यार ऋद्धि मंत्र जपने से सम सिद्धियां प्राप्त दोषी हैं ।




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