योग - समन्वय भाग - १&२ | The Synthesis Of Yoga Part - 1&2

The Synthesis Of Yoga Part - 1&2 by श्री अरविन्द - Shri Arvind

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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भूमिका 15 उदाहरण देखनेमें नहीं आते । बस्सुस जब मनुष्य अपनी दृप्टि और शक्ति अंतरकी सोर मोड़ता है तथा योग-मार्गमें प्रवेश करता है तो ऐसा माना जाता है कि यह हमारे सामूहिक जीवनके महान्‌ प्रवाह और मनुष्य- जातिके लोकिग प्रयपरनके छिसे अनिवार्य कूपसे निकम्मा हो गया है। यह विधार इतने प्रवल रपमें फैल गया है लोर इसपर प्रचलित दर्शनों और धर्मोने इतना धर दिया है मिं जीवनसे भागना आजकल केवरू योगकी आवश्यक शर्ते ही नहीं घरन्‌ उसका सामान्य उद्दे्प भी माना जाता है। योगका ऐसा कोई भी समन्वय संतोपप्रद नहीं हो सकता जो अपने थ्यमें भगवानू और प्रइतिको एक मुक्त और पूर्ण मानवीम जीवनमें पुन संयुक्त नहीं कर देता या जो अपनी पद्धति्में हमारे आंतरिक और बाह्य कर्मों और सनुभबोमें समन्वय स्थापित परमेकी अनुमति ही नहीं देता यस्फि उसका समर्थन भी नहीं करता इस कार्यो दोनों अपनी चरम दिव्यताफो प्राप्त गर सेते हैं। गारण मनुष्य एक उच्चतर जीवनका उपयुक्त स्तर एर्व प्रवीक है वह एक ऐसे स्पृूष नगतुरमे अबतरित हुआ है जिसमें निम्न तस्वषा रूपांतरित होना उच्चतर तत्त्वके स्वभावको प्रहण करना और सभ्यतर तत्यषा निम्न तस्वमें भपने-आपफो अभिव्पक्त करना संभव है। एक ऐसे जीषनसे बचना जो उसे इसी समावनाकों नित्य करनेके सिसे दिया गया है फभी भी उसके सर्वोच्च प्रयत्तवी अनिवायें शर्ते या उसका समस्त और अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता न ही यह उसभी आत्म-उप- रूष्पिके अत्यधिक सवल साधनकी शर्तें या रुक हो सकता है। यह किन्हीं विशेष अवस्था्ंमिं एव सस्थायी आवश्यकता तो हो सबया है था यह एक ऐसा विशिप्ट मंतिम प्रयत्न भी हो सकता है णो व्यक्तिपर इसलिये सादा जाता है कि यह पूरी नातिके सिये एक महत्तर सामान्य सभाषनाकों हैयार कर सके। योगका सच्चा और पूर्ण उपयोग यौर चद्देश्य तभी साधित हो सकते हैं जघ कि मनुप्यक॑ अंदर सचेतन योग पैसा कि प्रकृतिमें अबचेतन योग होता है बाहात भीयनके साथ समान रूपसे ब्यापक हो शाय। सौर तभी हम मार्ग जौर उपरूब्सि दोनोको देखते हुए एक वार फिर एक अधिक पूर्ण और सासोकिंस सर्थेमें कह सकते हैं. समस्त जीवन ही योग है।




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