सुधा सामाजिक और साहित्यिक मासिक पत्रिका | Sudha Samajik Aur Sahityik Masik Patrika

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
श्रेणी :
Book Image : सुधा सामाजिक और साहित्यिक मासिक पत्रिका  - Sudha Samajik Aur Sahityik Masik Patrika

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

No Information available about श्रीदुलारेलाल भार्गव - Shridularelal Bhargav

Add Infomation AboutShridularelal Bhargav

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
प्न 555 555 25 2555 25255257225252555घघ5.घघकनििपयययया न रफयरानयगाायदमपगयपपाालायापपयपयफयपयानयलफपपायगगयापाापपपातपतपायललपगलकग दल चिपक लि्ीकिय ० लय ० एक लि थक कुरूप सुख-दुःख लगाव श्रौर बेलगाव हमको क्या करना चाहिए और क्या न करना चाहिए इत्यादि बातों का विचार सबको होता हे । हम लोग सदा इन शब्दों का प्रयोग करते श्रौर प्रत्येक चस्तु के विषय में अपना मसंतब्य स्थिर कर सेते है कि उसने अच्छा किया अच्छा नहीं किया ठीक किया या ठीक नहीं किया सफल हुमा या सफल नहीं हुआ चह बुरा है वह झच्छा है । ऐसे वाक्य किसके मेंह से नहीं निकलते । वह कौन है जो इन शब्दों के झभिप्राय सीखने और समभने के विचार से उनके प्रयोग करने मे सकोच करेगा ? या संगीत- शास्त्र या रेखागणित के शब्दों की भाँति उस विद्या को बिना जाने नित्य के बोल-चाल में इन शब्दों के प्रयोग करने में सोच-विचार करेगा । इसका कारण यह है कि जब दम संसार में आ्राते हैं उसी समय श्ाप-से-श्राप इन विपयों की शिक्षा दी जाती है या यो कहना चाहिए कि प्रकृति इसको कुछ शिक्षा देकर ससार मे मेजती हे इस- लिये हम लोग नित्य के व्यवहार में अपनी बुद्धि से काम लेते है । जेसे हम लोग कहते हैं-- प्रश्न--भले और बुरे में विवेक केसे किया जाता है ? उत्तर--क्या हम इतना भी नहीं जानते । प्रश्त क्या प्रत्येक वस्तु पर इन शब्द का प्रयोग नहीं करते ? उत्तर--झवश्य करते हैं । प्रश्न --क्या हमार प्रयोग करना ठीक नही है ? इसी प्रश्न के उत्तर में संदेह है श्रौर यहीं आदमी अपनी बुद्धि से काम लेता है । पहले तो. तकं-वितर्क में ऐसी बातें कही जाती हैं जिसमें किसी को संदेह नहीं है परंतु परिणाम ऐसा निकाला जाता है जिसमे बहुत कुछ सदेह है । प्रयोग करने की यह रीति ठीक नहीं है क्योंकि प्रारमिक बुद्धि के साथ तुम्हे प्रयोग की रीति सुधा बप ८ खंड संख्या ? भीथ्ा गई तो सिद्ध होने में फ्या कसर रहे जायगी । परतु तुम यह समझते हो कि हम अपनी सुद्धि का प्रयोग उचित करने हैं। हम तुमसे यह पूरे हैं कि तुमको इसका विश्वास केसे हो गया हैं ? तुम यहीं कहोगे कि हमको ऐसा ही जान पढ़ता हे । परंतु तुम्हारे साथ एक शोर है जिसको ऐसा नहीं जान पड़ता तो फ्या वह श्रपने प्रयोग को ठोक नहीं समझता ? उत्तर --हाँ) वह भी ठीक समभता है । प्रश्न -यह भी संभव है. कि तुम दोनो अपनी अपनी बुद्धि का दीक-ठीक प्रयोग करते हो पर ते तुम दोनों में इतना मतभेद है । उत्तर -कभी नहीं । तो फिर तस्दारे पास अपने प्रयोग के ठीक होने का शोर भी कोई प्रमार है / क्या यह है कि हमको ऐसा जान पहना है । कया जान पड़ना ही प्रमाण हो तो पायल भी यहीं काम करता है जो उसको टीक जे वता हैं उत्तर--कभी नहीं । प्रश्न --तो श्रब उस बात की सरोज करने चाहिए. लो जान पढने से भी गद़कर हैं । ४-उत्तर-सोचों । विज्ञान की जब यहीं हैं कि मनुष्य के मतमंद पर विचार किया जाय पर यह देखा जाय कि इस मतमेद का कारण क्या है ्पनी राय को तुच्छ समभो शरीर उप पर विश्वास न करो । विज्ञान को श्राघार इस विषय की जौँच है कि यो कुछ हो रहा हे. चहू सत्य है या श्सत्य भर रैसे हम तौलने के लिये तराज्न आर सीधी व टढ़ के लिये सुहावल बनाते हैं इसी तरह इस विषय की जाँच के लिये नियम बना ले । सिज्ञान का पहला सिद्धांत यहीं है जेसे इस बात पर विचार किया जाय कि जो विषय किसी को उचित जल रहा हैं वह समीचीन हैं या उसके उचित जँचने पर हो




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now