स्त्री के पत्र | Stree Ke Patra

Stree Ke Patra by चंद्रशेखर - Chandrashekhar

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ रद 2) थी झाब सी नहीं है । यदद मैं जानती थी कि श्राप मेरे पति हैं मे थह भी जानती थी कि जिस तरह और ख्री-पुरुष रहते है उसी तरह इमलोगों को सी रदन्त होगा पर यह तो नहीं जानती थी कि शाप किस तरीक़ पर बासें करते हैं श्ापकों केंसी बाते पसन्द हैं । सच्ची बात यह हैं कि में उस समय आपसे बाते करना चाहती न थी | मेरे पास बासें बहुत थीं वर श्रापका सुन्दर मुँह देखते ही मेरा हृदय प्रकाशित होसया था उस समय मेरे इदय में जो भाव आये वे मिलकुल नये थे । पिता के घर में पनी सखियों से आपके सम्बन्ध की बातें में जब तब कर लिया करती थी । उस समय भी मन में कई लरद के भाव उत्पन होते थे। पर उस खब भावों से यह साथ विलकण था .जो पहले पहल श्रापके पास चेटकफर आपके मुँह देखने से मेरे मन में उत्पन्न छुआ । मुझे उस समय मालूम हुआ कि आज मेरे हृदय-मन्दिर में एक सजीव सतिया की स्थापना दो रही है । में अपने सौशाग्य पर मस्त थी श्रौर छाप व्याख्यान देने को कह रहे थे। यदि शाप उस समय मेरा हृदय पहचानने का प्रयत्न करते यदि श्याप पक शापरिचित को जानने की कोशिश करते तो मेरी समझ से पेसा उल्दना देने का अवसर न आता । उस समय भी में बोल सकती थी पर बोलमें का शवसर न था । आाज अवसर हैं बोलती हूँ । इसमें श्ाश्यय की बात




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