भागो नहीं दुनिया को बदलो | Bhago Nahi Duniya Ko Badalo

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Bhago Nahi Duniya Ko Badalo by राहुल सांकृत्यायन - Rahul Sankrityayan
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 44.81 MB
कुल पृष्ठ : 376
श्रेणी :
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राहुल सांकृत्यायन - Rahul Sankrityayan

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दुनिया नरक है हद भव ह सैया--उन सफेद कपड़ोंके भीतर ही भीतर कितना. घुद्आाँ उठ रहा है यह तुम्हें नहीं सालूम है ढुक्खू भाई पहिले कमी जमाना था कि विद्या का मोल जियादा था । इन्ट्रै सभी नहीं पास होते थे कि लोग वकोल मुंसिफ सदर- ्राला हो जाते लेकिन अब एमू० ए.० बी० ए.० पास कर चालीस-चालीस रुपल्लीकी नौकरीके लिए. इधर-उधर मारे-मारे फिरते हैं । डेढ़ सेरका श्राटा सवासेरका चावल चार रुपया सेर घी श्रद़ाई रुपया मन ई धन बताश्रो चालीस रुपपेमें तो श्रकेले आदमीका भी पेट नहीं भर सकता । फिर मकानका किराया तिंगुना । पैर पसारने पर इस दीवारसे उस दीवार पहुँच जायेँगे ऐसी-ऐसी कोठरियोंका किराया पाँच रुपया महीना । कपड़ेका दाम भी चौगुना । फिर बाबू अकेले नहीं होते । माता-पिता ्रपने पैर पर खड़ा कर नेसे पहिले लड़केका ब्याह कर देते हैं श्रौर पचीस बरसके होते-होते बाबूके चार पाँच बच्चे भी हो जाते हैं ।अब बेताश्रो चालीस रुपयेमें वह क्या अपने खायेंगे कया बीबी श्रौर बच्चोंको खिलायेंगे १ कहाँसे घर भरके लिए कपड़ा ले आयेंगे मकानका किराया कैसे दें ? लड़कोंकी फीस कहाँसे झायेगी यदि लड़के लड़कियोंको पढ़ाया नहीं तो उन्हें भीख .मी नहीं मिलेंगी । फिर लड़कियों के न्याहके लिए ददेजका रुपया कहाँसे श्ाये ? उनके घरके घर तपेदिकर्में उजड़ जाते हैं। ठीकसे खाना नहीं चिस्ताके मारे दिन-रात कलेंजा सुलगता रहता है दचाका भी ठिकाना नहीं । इतने कमजोर सरीरमें तपेदिक क्यों न घुसे ठोक कहता हूँ दुक्खू माई बाबू लोगोंके घरके घर साफ़ हो गए । दुखराम--मैं तो समकता था मैया कि बाबू लोग बहुत अच्छी तरहसे होंगे खूब लोगोंसे रुपया ऐठते हैं । सी सैया--सौ में पाँच तो सभी जगह अच्छे मिल जायेंगे । जानतें नहीं हो वकालत पास करके कचहरीमें राधे लोग सिंफ मकक्‍खीं मारने जाते हैं । इधर-उधरसे माँग-जाँचके पैसे दो पैसेका पान खाकर मुँह पर रोब और रोसनी लाना चाहते हैं? लेकिन दुब्खू भाई रोसनी मुँहमें खैर-चूना लपेटनेसे नहीं आती । जब श्रादमीको पेट मर खानेको मिलता है निचिंत रहता है रोसनी ब्पने श्राप भलकने लगती है ।तुम समभते होगे कचहरीके मुहरिर थाना




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