जीवन के पहलू | Jeevan Ke Pahalu

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Jeevan Ke Pahalu by अमृत राय - Amrit Rai

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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जीवन के पहलू हैं। वद्दीं एक तीन पैसे वाली गेंद रखी है जिस पर ऑ्रैग्रेजी का हू लिपा-पुता है। वहीं एक एक-पैसे वाली सारंगी है श्रौर एक बिगुल जो श्रब लाख फूँकने पर भी नहीं बोलता । माँ की णदस्थी तीन वर्ग गज में विकीर्ण है । उसमें हल्दी सोंठ सँघा नमक सिल ( जिसको खुदवाने की सख्त जुरूरत महसूस की जा रही है) बड़ा सभी है । वहीं एक पीपल के पत्ते पर चूना श्रौर कुछ सड़ी खदरी हुई सुपारियाँ रखी हुई हैं जिन्हें तबियत ऊबने पर अपेह दम्पति खा लेते हैं । चोखे कहीं से बिसकुट का एक बड़ा डब्बा पा गया था । व अब एक झ्ाले में रखा है । एक ताक पर एक लाल-नीली पेंसिल रखी है जिससे दस साल के बड़े लड़के ने श्रास- पास खूब खैंचा रखा है--बेसिर-पैर की हजारों रेखाएँ । पास दही एक तवा रखा है जिसके बीच छेद है झोर जो अब माँ की रददस्थी से काला- पानी है । एक लकड़ी का मोटा लट्टा रखा है । पास ही एक कल्द्ाड़ी रखी है । दोनों बच्चे आपस में लड़ रहे हैं और इस तरह खाँव-.खाँव करते हैं जैसे बंदर के बच्चे हों माँ ने दाँडी में पकाने को कुछ रख छोड़ा है श्रौीर वह इन छोकरों की लड़ाई पर खीक रही है । एक संग ही लड़कों को गुर्यकर चीख पड़ती है श्रौर फिर पति की शोर देखकर-- कैसे हो? दो बच्चे भी नहीं समाल पाते १? कैसे बेठे हैं जैसे बुद्ध भगवान हों । इस पर उसे एक विचार सूकतां है श्र वह कहती है--हाँ नहीं तो जैसे बुद्ध भगवान्‌ हों । नहीं नहीं बुद्ध नहीं बुदुधू । तर उसने चोखे के मुख की श्रोर देखकर चाहा कि समभोते के तौर पर उसे हंसाकर हँस दे । पर वह ठिठक जाती है श्रौर चोखे के शैठ




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