मानव - दर्शन | Manav Darshan
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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
10.8 MB
कुल पष्ठ :
196
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)सानव-जीवन की समस्या, सानव-दुर्शन का सहत्त्व
प्रत्येक सानव से तीन बाते है, जानना, मानना श्रौर करना । जब
तक इन तीनो मे सामब्जस्य रहता है तव तक मानव उत्तरोत्तर विकास
की श्रोर बढता रहता है । जब इस सामज्जस्य में श्रसतुलन झ्रा जाता
है तब मानव पराधीनता, अभाव भ्रादि दोषों में ग्राबद्ध हो जाता है ।
इस कारण यह श्रत्यन्त झावदयक है कि मानव ग्रपने जानें हुए का
श्रादर करे । जाने हुए के प्रभाव से ही किए हुए के प्रभाव का नाश
होता है, जिसके होते ही करने का राग मिट जाता है । राग रहित
होते ही सेवा, त्याग, प्रेम आदि दिव्यता की जीवन में श्रभिव्यक्ति
स्वत होती है ।
प्राकृतिक नियमानुसार जो मानव निज विवेक का शझ्रादर नहीं
कर सकता वह सदग्रत्थो एव गुरुजनों से प्राप्त प्रकाश का भी श्रादर
नहीं कर सकता । इस कारण प्रत्येक मानव को निज विवेक का झ्रादर
करना शभ्रनिवायं है ।
सुने हुए मे आस्था होती है भ्रौर जाने हुए का श्रनुभव होता है ।
अनुभव विकल्प रहित होता है । देखे हुए मे श्रर्थात् प्रतीति में समता,
कामना एव तादात्म्य होता है । इस दृष्टि से देखे हुए मे श्रौर जाने
हुए में बडा भेद है । जाना हुभ्रा दर्शन है, देखा हुमा नही ।
मानव जो भी जानता हैं उसका यदि झ्रनादर न करे तो वह ममता,
कामना श्रौर तादात्म्य से रहित हो सकता है । ममता, कामना और
तादात्म्य के रहते हुए किसी भी मानव को निर्षिकारता, परमच्षान्ति
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