अतः कबीर शतक | Atha Kabir Shatk

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Atha Kabir Shatk by अज्ञात - Unknown

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कर भाषा ठीका छू १७ हक की की 2 के की 2 कक कक परें सब माझ भरे ॥ २४ ॥ मल . कथितो गणवानेष, बिजया जय संग्रह ॥ ं ररररसानतीरटारपारतों २५ वद्दी ग़ुणबान जासो कददत गुणीलै छो ग, वही योग भोग जासों कदत ककार है । वद्दीदे बिजय जग जुरे जैेतबारनि में, वही पारजाय जाको नाम यो बकार हे ॥ वही र रंकार राति दय्यौस ध्वनि लागी रहे, जागि रहे ज्योति सोई दीसे बारपार है। ताददीते कह तहैं कबीर तीन अंक जोरि,; मोरि २ की- नो जग कानन कुहार है ॥ २५ ॥ मूठ कण कमें निहोरी, बिहारी रति बद्धन । रविरये राजतेयो, यत्कवीर'सचोच्यत २६ दीका .. कहीं निज कर्म तासो कटत बिकर्म सब, तबडह्दे असैक गांवे केवठ ककार को 1 वन




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