आत्मतत्त्व-प्रकाश | Atma Tattva Prakash

Atma Tattva Prakash by डॉ. सतीशचन्द्र विद्याभूषण - Dr Satishchandra Vidyabhushan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(१४) चडें दुःख ९ साथ लिखते हैं कि इस संस्क- रणसें उपर लिखी किसी आज्ञाका भी पालन दम न कार सके । जीवात्सा के विषय में न्पाय- ास््रका जो मत है उसी दो व्याख्या इस पुरतक में की हैं अन्य कोइ दिपय नहीं छुआ गया | सारतवर्प के द्शनशास्त्रों का इतिद्ास 'स्वतन्त्ररूप में लिखने की इच्छा है; इसलिए इस पुस्तकें प्रकाशित “इतिहास से कोई चूद्धि नहीं घ्यीगटे । सात आठ चपे पहले हमारी घारणा थी कि प्राचीन ग्रन्थों में से कोई नई वात निकालना ही पर्याप्त होता है; उन ग्रन्थों का नाल और उनके वचन 'इमारे लिए ( उस समय ) चिद्ोष आद्रकी वस्तु नहीं थे । किन्दु अच माठूम हुआ, कि विना प्रसाण के पाय्यात्य पण्डित किसी तत्व की पवोह् -नहीं करते । अघ किसी दतन तत्व के उद्धार करने वी बजाय उसे तत्त्व के प्रसापक ग्रन्थों ही की ओर हमारा ध्यान आकर्षित हुआ है । सात जाठं वष पहले हमारे विचार क्या थे इस बात 'को लिपिवर रखने के' अभिप्राय से-वत्तसान




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