वेदान्त - दर्शन | Vedant - Darsan

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Vedant - Darsan by हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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(२५६ सं विषय पृष्ठ १७-१९. इन्द्रियंति मुख्य प्राणकी मिन्नता कर र२५-र२७ २०... जहमसे दी नाम-रूपकी रचनाका कथन दर रर७ अर सब त्त्चोका सिशण होनेपर भी प्थिवी आदिकी अधिकतासे उनके प्रयक्‌-प्रयक्‌ कार्यका निर्देश इर७-ररद तीसरा भध्याय पहला पाद शरीरके चीजभूत सूक्ष्म तर्वॉसिहित जीवके देदान्तरमे गमन- का कथन पॉचवीं आइुतिमें जल पुरुपरूप हो जाता है शरुतिके इस वचनपर विचार उस जरमें सभी तच्वोंकि सम्मिश्रण- को कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार न इर्दसा खर्गमें गये हुए पुरुषकों देवठाओंका अन्न बताना औपचारिक छ दि जीव खर्गसि कर्मसंस्कारोको साथ लेकर लौटता है श्रतिमें ्वरण झाच्द कर्मसंस्कार्रोका उपछक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है इसका उपपादन र३५-२३८ धापी जीव यमराजकी आश्ासे नरकमें यातना भोगते हैं खर्गमि | नहीं जाते कौषीत्तकिशुतिमे भी समस्त झुभकर्मियोंके छिये ही सर्गगमनकी ब्रात आयी है इसका वर्णन रशट-र४१ । यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे मिन्न एव अधम चौथी गतिहै) इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवॉंका उद्धिलमें अन्तर्माव र४१-९४३ स्वरगसि छोटे हुए(जीव क्रिस प्रकार आकाश वायुःघूम मेघ धान जौआदिमें खित होते हुए क्रमशः गर्भसे आते हैं इसका स्पष्ट बर्णन १ रह रै-र४५ दूसरा पाद खम्म मायामात्र और झुमाशुभका सूचक है भगवान्‌ ही जीवकों दर नियुक्त करते हैं जीवमें ईः्वरसडश शुण तिरोदित हैं १२-१७ श्ट-रेरि रर-र७ परमात्माकि ध्यानसे प्रकट होते है उसके अनादि चन्धन और मोक्ष भी परमात्माफे सकाशसे हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोमाव देदके सम्दन्धसे है कर र४६-२५० सुषुचतिकाउमे जीवकी नाडियोंकि मूलभूत इदयमें स्थिति) उस समय उसे परमात्मामे स्थित बतानिका रहस्य सुपुप्तिसे पुनः उसी जीवके जामत्‌ होनेका कथन तथा मूर्च्छांकाछमों अघूसी सुषुतावस्थाका प्रतिपादन ... र५०-२५३ छ-रै०




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