वेदान्त - दर्शन | Vedant - Darsan

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
शेयर जरूर करें
Vedant - Darsan by हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka
लेखक :
पुस्तक का साइज़ : 11.19 MB
कुल पृष्ठ : 414
श्रेणी :
हमें इस पुस्तक की श्रेणी ज्ञात नहीं है | श्रेणी सुझाएँ


यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटी है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं |

लेखक के बारे में अधिक जानकारी :

हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka

हरिकृष्णदास गोयन्दका - Harikrishnadas Goyndka के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है | जानकारी जोड़ें |
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश (देखने के लिए क्लिक करें | click to expand)
(२५६ सं विषय पृष्ठ १७-१९. इन्द्रियंति मुख्य प्राणकी मिन्नता कर र२५-र२७ २०... जहमसे दी नाम-रूपकी रचनाका कथन दर रर७ अर सब त्त्चोका सिशण होनेपर भी प्थिवी आदिकी अधिकतासे उनके प्रयक्‌-प्रयक्‌ कार्यका निर्देश इर७-ररद तीसरा भध्याय पहला पाद शरीरके चीजभूत सूक्ष्म तर्वॉसिहित जीवके देदान्तरमे गमन- का कथन पॉचवीं आइुतिमें जल पुरुपरूप हो जाता है शरुतिके इस वचनपर विचार उस जरमें सभी तच्वोंकि सम्मिश्रण- को कथन और अन्यान्य विरोधोंका परिहार न इर्दसा खर्गमें गये हुए पुरुषकों देवठाओंका अन्न बताना औपचारिक छ दि जीव खर्गसि कर्मसंस्कारोको साथ लेकर लौटता है श्रतिमें ्वरण झाच्द कर्मसंस्कार्रोका उपछक्षण और पाप-पुण्यका बोधक है इसका उपपादन र३५-२३८ धापी जीव यमराजकी आश्ासे नरकमें यातना भोगते हैं खर्गमि | नहीं जाते कौषीत्तकिशुतिमे भी समस्त झुभकर्मियोंके छिये ही सर्गगमनकी ब्रात आयी है इसका वर्णन रशट-र४१ । यम-यातना छान्दोग्यवर्णित तीसरी गतिसे मिन्न एव अधम चौथी गतिहै) इसका वर्णन तथा स्वेदज जीवॉंका उद्धिलमें अन्तर्माव र४१-९४३ स्वरगसि छोटे हुए(जीव क्रिस प्रकार आकाश वायुःघूम मेघ धान जौआदिमें खित होते हुए क्रमशः गर्भसे आते हैं इसका स्पष्ट बर्णन १ रह रै-र४५ दूसरा पाद खम्म मायामात्र और झुमाशुभका सूचक है भगवान्‌ ही जीवकों दर नियुक्त करते हैं जीवमें ईः्वरसडश शुण तिरोदित हैं १२-१७ श्ट-रेरि रर-र७ परमात्माकि ध्यानसे प्रकट होते है उसके अनादि चन्धन और मोक्ष भी परमात्माफे सकाशसे हैं तथा जीवके दिव्य गुणोंका तिरोमाव देदके सम्दन्धसे है कर र४६-२५० सुषुचतिकाउमे जीवकी नाडियोंकि मूलभूत इदयमें स्थिति) उस समय उसे परमात्मामे स्थित बतानिका रहस्य सुपुप्तिसे पुनः उसी जीवके जामत्‌ होनेका कथन तथा मूर्च्छांकाछमों अघूसी सुषुतावस्थाका प्रतिपादन ... र५०-२५३ छ-रै०




  • User Reviews

    अभी इस पुस्तक का कोई भी Review उपलब्ध नहीं है | कृपया अपना Review दें |

    अपना Review देने के लिए लॉग इन करें |
    आप फेसबुक, गूगल प्लस अथवा ट्विटर के साथ लॉग इन कर सकते हैं | लॉग इन करने के लिए निम्न में से किसी भी आइकॉन पर क्लिक करें :