रेती के फूल | Reti Ke Phool

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Reti Ke Phool by रामधारी सिंह दिनकर - Ramdhari Singh Dinkar

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रामधारी सिंह 'दिनकर' ' (23 सितम्‍बर 1908- 24 अप्रैल 1974) हिन्दी के एक प्रमुख लेखक, कवि व निबन्धकार थे। वे आधुनिक युग के श्रेष्ठ वीर रस के कवि के रूप में स्थापित हैं।

'दिनकर' स्वतन्त्रता पूर्व एक विद्रोही कवि के रूप में स्थापित हुए और स्वतन्त्रता के बाद 'राष्ट्रकवि' के नाम से जाने गये। वे छायावादोत्तर कवियों की पहली पीढ़ी के कवि थे। एक ओर उनकी कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की पुकार है तो दूसरी ओर कोमल श्रृंगारिक भावनाओं की अभिव्यक्ति है। इन्हीं दो प्रवृत्तिय का चरम उत्कर्ष हमें उनकी कुरुक्षेत्र और उर्वशी नामक कृतियों में मिलता है।

सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया ग

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१०. सिठास और मुद्दब्बत की रंगीनी से छका रददता है। इस उम्र में आदमी फूलों के कपोलों पर टपकनेवाली शबनम की आवाज को सुन सकता है और उषा के प्रदेश में जो माधुरी और सौरभ है उसे जी भरकर अपने भीतर खींच सकता है। सगर चालीसा लगते ही नाटक के परदे बदलने लगते हैं और यह परिवतेन आदमी को अच्छा नहीं लगता । इस समय किसी-किसी को यह भ्रम भी दो जाता हे कि उसके स्वास्थ्य सें कहीं कोई गड़बड़ी तो नहीं हो गईं है उसका ामाशय कुछ खराब तो नहदीं हो गया है और बह डाक्टर से पूछ-ताछ करने लगता है। मगर डाक्टरों की प्रायः एक ही राय होती है कि सब ठीक है कोई खास बात नहीं जरा खाने-पीने पर ध्यान रखिये । लेकिन खाने-पीने से क्या होता है ? चाहे जितना खाओो चाहे जितना पीयो चालीस के बाद आनन्द की दिशा बदल जाती है । मैंने उम्र की तलवार से कटे हुए कितने ही लोगों को मींखते देखा है। लेकिन यदद मींखना किस काम का ? दोपददरी को उषा बनाना कठिन है और फिक्र करने से तो दोपदरी और भी तेजी से ढलने लगेगी। समय रुकने का नहीं वह बढ़ता दी जायगा । और यह भी ठीक है कि उषा के जो कर्त्तव्य और ानन्द हु वे दोपददरों के कर्तव्य और आनन्द से भिन्न होते ह। लेकिन यह सममना भूल है कि भोर सें आदमी को जेसा संतोष श्राप्त दोता है दोपहर में उसे बेसा




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