हिंदी काव्य पिछला दशक | Hindi Kavya Pichhla Dashak

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Hindi Kavya Pichhla Dashak by डॉ गोविन्द रजनीश - DR Govind rajnish

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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ह विस्वासों परम्पराभों-का उ सूलन हुमा जिससे काव्य भव्यहत भर यपार्य स्वरूप ग्रहण कर वलात्मक हष्टि से भपने लोक-मगर्लवारों लंदय की भार उपुस हो सका । ३9 म्युदय यंग 1 द्ौ थ् भारतेदु-युमीन पर ड्िवेदी-युगीन बवित्ताए -किसी भी वाद के पन्तर्गत मही घ्राती । इस नदोन युग में भालोचको ने कविता | को वादा का मावर्ण पहना दिया। नये वादा का भाविरमाव चिता के झाकर्मिक मौड का सूचक रहा है। 1 | इस युग का काव्य कलात्मक स्वंतबना के लिये प्यासा रहा है क्पीकिं उसमे दिशिष्ट मूल्यों के प्रति तीव्र भनुभूति सलिहित थी । यहीं कारण हि कि युग का काव्य स्पूल का विंरीपी प्रौर सुदम वा सार्थक टरआ वयीकि उस स्थूलता में न ती क्लात्मकता थी न यपार्थ जीवन की अभि मजनीए 1 सुदम साधना में यपार्य भ्रनुमूतियों की भमिव्यजना होती है तथा स्पन्दनों का मो सरलता से भद्धित किया जा सकता है । राजने तिक स्वत ब्रठा मे सघप ने नये मूस्य। की प्राप्ति के लिए / देश को सनद्ध कर दिया काव्य की भ्रात्मि भी. जीशं-शीर्ण परिवेक्ष| लो -उत्तारकर नयी दिशा की झोर उ मुख होती रही । नवीन को /भाह्वांन उहुमा १। प्राथमिक रूप में जीशा-शीश परर्प्रॉधी का विरोध विगलिंत ुप्ठाप्ों घोर निराशोथ्ा केरूप में हुमा । लेविस श्रस्त में सधर्ष हुभा भौर स्वच्छन्दती का स्पट मुखर हुमा 17 1 गत 7 विवेच्य दशक ११४१-६७ का काव्य भम्युदय युग वी इस साहित्यित चेतना से अनुस्युत तथा श्नुप्नाणित है । इस युग से पिछले दशक सब को पैंट .. १. छपकास्त निर्पाठी लिराला सोहिका दूतीय संस्करण पृष्ठ ३ ।




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