हिंदी काव्य पर आंग्ल प्रभाव | Hindi Kavya Par Angel Prabhav

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Hindi Kavya Par Angel Prabhav by एस सी देव -s c dev

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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। ( ११९) उपरान्त कलाकारों के लिए राप्य का आश्रय भी न रहा और वे श्रय श्रन्य राजाओं, नवाबो और बड़े बडे रईसों के यहाँ श्राश्रय के लिए जाने लगे। यहाँ बे अपने आराभयदाताओं के विलासमय जीवन को कला के माध्यम द्वारा उत्तेजित करने का प्रयास करते रहे और इस प्रकार अनुभूति प्रधान कला के वास्तविक स्वरूप का हास होने लगा । फलत मृगलकाल में कला जनजांवन से प्रथक्‌ जा पड़ी श्रोर वह जनवाणी को व्यक्त करने को श्रप्ेत्ञा श्रब कतिपय श्रमौर व्यक्तियों के जीवन की रगीनियों को ध्वनित करने लगी | मुसलकाल में धमं का भी हात होने लगा । इस काल का हिन्दू घ॒र्म मध्य कालीन भक्ति प्रा का क्षीण चिह॒नमात रह गया था | औरगरन ब की मृत्यु के बाद तो यदि किसी प्रकार का उत्साह शेष था तो वद जीवन की रग्रीनियों के लिए। धर्म का केयल बाह्य रूप हीं शेष रह गया था | धर्म का दार्शनिक अथवा तात्विक पक्ष जनता भूल चुकी थी श्रौर रूढिगति एवं परम्परागत विधियों को ही उसका असली स्वरूप मानने लगी थी। लोगो में श्रन्धविश्वास श्रधिक था श्रौर घमम फे नाम पर अनेक सारदीन रीतियों का प्रचलन ही श्रवशेप था | मग़लकाल की विलामिता दरबारों श्रौर हरमों तक ही सीमित न रहकर धर्म के क्षेत्र में भी प्रवेश कर चको थी | माधव, निम्बारं, चेतन्य, राधावल्लभ मतों में राधा को प्रधानता दी जाने लगो थी जिमके फलस्वरूप जन समाज श्गास्तिश्रौर बिलामिता की शरोर श्रौर मी श्रथिक उन्मुख होने लगा था। इन मतो की गद्या तो एेरवयं विना की केन्द्र थीं । उधर मन्दते श्रौर मों में भी देवदासी प्रथा के पचलन से श्रनैतिजता बढ रही थी। (२) रीतिकालीन काव्य की मुख्य प्रवृत्तियाँ हम देख चुके हैं कि रीतियुग में कनाकारों को श्रपने भग्ण पोपण के लिये उच्चपर्ण के लोगो का श्रथव योजना एड़ता श्र । आतंक करियों के लिये यह श्रावश्यक था कि पे श्रपने श्राश्चयदाताश्रो कौ मनोत्रत्ति के श्रनुमार काब्य का सृजन करें | राज्याश्रय में पली इस कविता में श्रलकार-प्रियता का होना स्वाभापिक ही था। श्लेप, यमऊ, इत्यादि काव्यगत विधियों से चमत्कार की भावना उत्पन्न कर अपने श्राभयदाताप्रों को प्रसन्न करना श्छ युग के कवियों का निरतर प्रयत्न होता था। उनकी कविता में कृत्रिम रूपको श्रौर रूढिगत उपमाओं का मेला लगा रहता था | ये तोते की भाँति चकवा, पर्षीहा, चकोर राजह8 इत्यादि पक्तियों के विषय में प्रचलित कितने ही रूपकों को श्रपनों




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