आर्य समाज का इतिहास भाग १ | Arya Samaj Ka Itihas Vol I

5 5/10 Ratings.
1 Review(s) अपना Review जोड़ें |
Arya Samaj Ka Itihas Vol I by सत्यकेतु विद्यालंकार - SatyaKetu Vidyalankarहरिदत्त वेदालंकार - Haridatt Vedalankar

लेखकों के बारे में अधिक जानकारी :

सत्यकेतु विद्यालंकार - SatyaKetu Vidyalankar

No Information available about सत्यकेतु विद्यालंकार - SatyaKetu Vidyalankar

Add Infomation AboutSatyaKetu Vidyalankar

हरिदत्त वेदालंकार - Haridatt Vedalankar

No Information available about हरिदत्त वेदालंकार - Haridatt Vedalankar

Add Infomation AboutHaridatt Vedalankar

पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

(Click to expand)
१६ कल लि श्रायंसमाज का इतिहास थी इतिहास-ग्रत्थ पूर्णतया निर्दोष तथा प्रमाणरूप श्रस्तिम रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता । शोध द्वारा ज्यों-ज्यों नये तथ्य प्रकाश में ग्राते जाते हैं, इतिहास में प्रतिपादित मस्तव्यों तथा वर्णित घटनाक्रम में भी परिवर्तन व संशोधन होता रहता है । इस इसिहास की कमियाँ भी शोध द्वारा धीरे-धीरे दूर की जा सकेंगी श क प्रयत्न करने पर भी उनके सम्बन्ध में प्रामाणिक सामग्री व जानकारी प्राप्त नहीं की जा सकी । पर इस सम्बन्ध में भ्रार्य स्वाध्याय केन्द्र का प्रयत्न निरन्तर जारी रहेगा । इस इतिहास के द्वितीय भाग में श्रार्यसमाज के प्रसार व विस्तार का निरूपण किया जाना है । . सन्‌ १८८३ तक स्थापित श्रायंसमाजों सें भी बहुसंख्यक की स्थापना सन्‌ १८८ १०८३ के काल में हुई थी । उनका समुचित रूप से विकास तो सन्‌ १८८३ के बाद ही हुमा था । भरत: इसमें कोई हानि व श्रनौचित्य नहीं, कि उनकी स्थापना तथा प्रारस्थिक कार्यकलाप का विवरण इस इतिहास के द्वितीय भाग में दे दिया जाए । महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी पर श्रनेक ग्रन्थ लिखे जा चके हैं । उनके जीवनवृत्त का बहुत संक्षेप से ही इस इतिहास में उल्लेख किया गया है, श्रौर उनके जन्म-स्थान शभ्रादि के विषय में जो श्रनेक मतभेद हैं, उनका कोई विवेचन नहीं किया गया, क्योंकि उनका झ्रायंसमाज के इतिहास के साथ विशेष सम्बन्ध नहीं है । इस इतिहास में कतिपय बातों की पुनरावृत्ति भी हुई है, जिसका प्रयोजन सर्बे- साधारण पाठकों के लिए विषय को सुस्पष्ट रूप से प्रस्तुत करना था । आ्राशा है, विज्ञव बिद्वान्‌ पाठक इसमें दोष-दशेन नहीं करेंगे, क्योंकि यह इतिहास ऐसे पाठकों द्वारा भी रुचिपु्वक पढ़ा जाएगा जो प्रौढ़ विद्वान नहीं हैं । मुभ्ठे ब्राशा है कि पाठक इस इतिहास के उपयोगी पाएंगे झ्रौर इस द्वारा भ्रायंसमाज सम्बन्धी साहित्य की एक कमी कुछ-न-कुछ अवश्य पुरी हो सकेगी । _ ९एप्रिल, १६४१... ल . -सत्यकेतु विद्यालंकार




User Reviews

No Reviews | Add Yours...

Only Logged in Users Can Post Reviews, Login Now