न आनेवाला कल | Na Aanewala Kal

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Na Aanewala Kal by मोहन राकेश - Mohan Rakesh

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१६ न भाने वाला कल एक वार मैंने उससे कहा भी था कि पैंतीस की उम्र तक अकेला रहकर मैं भपने को वहुत थका हुआ महसुस करने लगा हूं । तब उसने वहुत समझ- दारी के साथ आंखें हिलाई थीं --जैसे कि यह कहकर मैंने अपनी तब तक की जिन्दगी के लिए पश्चात्ताप प्रकट किया हो । मुझे पहली बार मिलने पर ही लगा था उसने कहा था आदमी अपने मन-वहलाव के लिए चाहे जितने उपाय कर ले पर रात-दिन का अकेलापन उसे तोड़कर रख देता है । इस वात में उसका हल्का-सा संकेत अपने पिता से सुनी बातों की तरफ भी था । मैंने उस संकेत को नहीं उठाया था क्योंकि खामखाह की लम्बी व्याख्या में मैं नहीं पड़ना चाहता था | उसने मेरे घर में आकर एक नई शुरुआत की कोशिश की थी पर वह शुरुआत सिफं उसके अपने लिए थी । उस शुरुआत में मुझे उसके लिए वही होना चाहिए था जोकि वह दूसरा था जिसकी वह सात साल आदी रही थी । घर कैसा होना चाहिए खाना कैसा वनना चाहिए दोस्ती कैसे लोगों से रखनी चाहिए--इस सबके उसके बने हुए मानदण्ड थे जिनसे अलग हट- कर कुछ भी करना उसे बुनियादी तौर पर गलत जान पड़ता था । शुरू-शुरू में जब मैं अपने ढंग से कुछ भी करने की खिंद करता तो वह आंखों में रुआंसा भाव लाकर पलकें झपकती हुई सिफं एक ही शब्द कहती अरे . मैं उस अरे की चुभन महसुस करता हुआ एक उसांस भरकर चुप रह जाता या मन में कुढ़ता हुआ कुछ देर के लिए घर से चला जाता । तब लौटकर आने पर वह रोये चेहरे से घर के काम करती मिलती । उसकी नज़र में मैं अव भी एक अकेला आदमी था जिसका घर उसे संभालना पड़ रहा था जवकि मेरे लिए वह किसी दुसरे की पत्नी थी जिसके घर में मैं एक वेतुके मेहमान की तरह टिका था । मैं कोशिश करता था कि जितना ज्यादा से ज़्यादा वक्‍त घर से वाहर रह सकूं रहूं । पर जब मजबूरन घर में रुकना पड़ जाता तो वह काफी देर के लिए साथ के पोशंन में शारदा के पास चली जाती थी । बीर्च में एक वार उसे कॉलिक का दौरा पड़ा था । तव कर्नल वरना ने जो दवाइयां लिखकर दीं वे उसने मुझे नहीं लाने दीं । कागज़ पर कुछ भर दवाइयों के नाम लिख दिए जो कुछ साल पहले वैसा ही दौरा पड़ने पर उसे न-प




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