पुरातत्त्व का रोमांस | Puratattv Ka Romans

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Puratattv Ka Romans by भगवतशरण उपाध्याय - Bhagwatsharan Upadhyay

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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पानीमे डूब गया, कि जिस प्रछ्यसे जीवोकी रक्षा सुरुप्पकके वीर जिउ- सुदुदूने उनके जोड़े नावपर बचाकर की, भौर जिसकी कहानी बाइबिलकी पुरानी पोथी हजरत नूहकी जीवनी मे, हमारे शतपथ ब्राहहणके मतुकी कथा- मे, भौर दूसरे साहित्योकी जलप्रलयकी कहानियोमे आज भी सुरक्षित है । उन प्राचीन नगरोंके नीचे आज भी सैकड़ो मोल लम्बी-चौड़ी जमीन- पर प्राय: ६ फुट गहराईके पानीके निशान पुराविदोने खोद निकाले हैं, और खोद निकाली है उन्होने ऊपरकी वे कब्र जिनके भीतर राजा और रानोके साथ उनके दास-दासियाँ, नौकर-बाँदियाँ, उनके रथोमे जुतनेवाले खच्चर जहरके प्याले पिलाकर दफ़ना दिये गये थे, जहाँ रानी शुबादके सुनहरे ब्रुच और सेफ़्टीपिन उस प्राचीनतम कालकों आजके जीवनमे झलका देते है । हम प्राचीनको वर्तमानके प्रतीको-द्वारा पहचानते हैं, और वर्तमानके प्रतीक जब प्राचीनके जीवनसे मिलने लगते है तब मानवके समसामयिक विस्तारके अतिरिक्त उसके कालान्तरकी समष्टि भी प्रस्तुत हो जाती है और हम इसके एकस्थ रूपको दृष्टिगोचर कर लेते है । रानी शुबादकी उन ऊरकी कब्नोसे दो हज़ार साल बाद शायद जूदियाके धीमान्‌ राजा सुलेमानका यश घरापर फैला जिसके गौरवसे खिचकर अरबकी रानी कोबा जुरूसलम चलो आयी थी । मोहनजोदडोकी लिपि निःसन्देह आजतक नहीं पढी जा सकी, जैसे क्रीतकी लिपि भी नहीं पढ़ी जा सकी, पर सर जेम्स प्रिन्सेप-द्वारा भारतोय ब्राह्मी लिपिका पढ़ लेना पुरातत्त्वके चमत्कारकी एक घटना है । मोहनजोदड़ोके दिनोसे ही उसका सॉड चलता-चलता कलाके अभिष्रायके माध्यमस सिख्र जा पहुँचा था, वहाँ भापिसू सॉड़के रूपमे पूजा गया था, फिर असुरोकी राजधानी कलामे उसने मानवमस्तक और पंख धारण किये, फिर दाराओके ईरानमे, प्तिपोलिसके महलोमे, उनके स्तम्भोके शिखरपर चिकने मानव मस्तक- धारी वे पुंगव बने, फिर शुद्ध प्रकृत पुंगव, और फिर वहीं लौटकर अपनी पुरातत्त्वका रोमास थ




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