संस्कृत रूपकों में लोक - संस्कृति | Sanskrit Rupakon Men Lok - Sanskriti

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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करता है ।' ऋग्वेद के सुप्रसिद्ध पृरुक-सुक्‍्त में लोक शब्द का व्यवहार जीव तथा स्थान दोनों अर्थों में हुआ है।* ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद में भी लोक का सड्केत मिलता है । अथर्ववेद में दो प्रकार के लोक की स्थिति व्यक्त की गयी है । एक मन्त्र में आये *कस्मात्‌ लोकातँ , , , , , ' का अर्थ है किस लोक से अर्थात्‌ एक से अधिक लोक की सम्भावना व्यक्त की गयी है । सम्भवतः यहाँ पर लोक शब्द भुवन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। अथर्ववेद के ब्रह्मचर्य सूक्त में भी ब्रह्मचारी के विषय में बताते हुए 'लोक' का प्रसज्ठ. आया है- वह (लोकान्‌ संगृभ्य) लोगों को इकट्ठा करता हुआ अर्थात्‌ लोक सड्य्रह करता हुआ और बार-बार उनको उत्साहित करता है।* 'यहाँ लोक का प्रयोग लोग के अर्थ में हुआ है । अआअधर्ववेद में ही उत्तम स्त्रियों की रक्षा के सन्दर्भ में लोक का प्रसद्ग आया है।” यहाँ 1. य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रतुष्टवम्‌ । विश्वामित्रस्य रक्षति ब्रह्मोदें भारत जनम्‌ 11. ऋग्वेद - 3/53/121 2. नाभ्या आसीदन्तरिक्षं, शीर्ष्णों: द्चौ समवर्तत. 1 पदभ्यां भूमि: दिश: श्रोत्रात्‌ , तथा लोकानकल्पयत्‌ ।। पुरुषसूक्त, ऋग्वेद । 3. कुतस्तौ जातौ कतम: सो अर्घ: कस्माल्लोकात्कतमस्या: | वत्सौ विराज सलिलादुदैतां तौ त्वां पृच्छामि कतरेण दुग्घा 11 अधथर्ववेद 8/9/1 1 3. ब्रह्मचर्योति समिधा समिद्ध: कार्ष्णक्सानो दीछ्ितो दीर्घश्मशु: / स सदा एति पूर्वस्पादुत्तरं समुद्रा लोकान्त्यसंगृम्य मुहुराचारिकत्‌ ।। अधथर्ववेद 11/5/7 4... यासामृषभो दूरतो वाजिनीवान्त्सद्य: सर्वानुललोकान्पर्येति रक्षन्‌ 1। अधर्ववेद 4/38/5 4. बहुव्याहितो वा अय॑ बहुशो लोक: 11. जैंमिनीयोपनिषद्‌ ब्राह्मण 3/28 | 5. संस्कृति के चार अध्याय - डॉ०0 रामधारी सिह दिनकर, पृष्ठ 162 |




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