हिंदी जैन साहित्य परिशीलन -भाग दूसरा | Hindi-jain-sahitya-parisheelan Vol-2; (1953)

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1831 Hindi-jain-sahitya-parisheelan Vol-2; (1953) by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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घ्तसाव काव्यघारा और उसकी विभिन्न प्रदूत्तियाँ २१ भह्दों झकंकार विहाय रत के, अनूप रत्नब्रप्र भूषितांग हो। तने हुए अम्बर अंग-भंग से, दिगस्वराकार विकार झून्य हो ॥ समीप ही जो परदेव दृष्य है, नितास्त इवेताम्बर सा बना रहा। अग्रंथ नि्दन्दू॒ महान संयसी, बने हुए दो निजधर्म के ध्वजी ॥ वस्तु-वर्णनमे महाकाव्यकी इृष्टिसि घटना-विधान, दृश्ययोजना और परिस्थिति-निमाण--ये तीन तत्व आते है । वद्धमानकी कथावस्तुमे प्रायः हद्य-योजना तत्वका अभाव है । घटनाविघान और परिस्थिति-निर्माण इन दोनों तत्वोकी वहुकता है । कविने इस प्रकारका कोई दृश्य आयो- लित नहीं किया है जो. मानवकी रागात्मिका इत्तन्त्रीकों सहज रूपमे झंकत कर सके । घटनाओंका क्रम मन्थर गतिसे बढ़ता हुआ आगे चलता है जिससे पाठकके सामने घटनाका चित्र एक निश्चित क्रमके अनुसार ही प्रस्तुत होता है । मद्दाकाव्यकी आधिकारिक कथावस्वुके साथ प्रासंगिक कथावस्ठुका रहना भी मददाकाव्यकी सफलताके लिए आवश्यक अग है। प्रासंगिक कथाएँ; मूलकथामे तीतरता उत्पन्न करती हैं | च्मान काव्यमे अवान्तर कथा रूपमे चन्दनाचवचरित, कामदेवसुरेन्द्र- रुवाद तथा कामदेव-द्वारा वर्द्धमानकी परीक्षा ऐसी मर्मस्पर्शी अवान्तर कथाएँ है, जिनसे जीवनके आनन्द और सौन्दर्यका आमास ही नहीं होता प्रत्युत सौन्दयंका साक्षात्कार होने रगता है । जगत्‌ और जीवनके अनेक रूपों और व्यापारॉपर विमुग्ध होकर कथिने अपनी विभूतिको चमत्कारपूर्ण ढगसे आविर्यूत किया है। भावोकों




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