सागर सरिता और अकाल | Sagar Sarita Aur Akal

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Sagar Sarita Aur Akal by रामचन्द्र तिवारी - Ramchandra Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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सागर - सरिता और अकाल टकरा अपने को लहू-छद्दान कर लेते हैं, निराशा, हाला अथवा मृत्यु में शॉति खोजने को विवद्य होते हैं; 'अनिल और सुद्दासिनी के लिए फूल-सी कोमल दो गई । अभी भनिल को पत्र मिला है कि आगामी सप्ताद उसका विद्दाद सुद्दासिनी से ड्ोने जा रद्दा है । अनिल को संसार जो अधिक से अधिक दे सकता था, वद्द उसने दिया । और अनिल समाज के प्रति कृतज्ञ तो इतना नहीं हुआ; पर अपनी प्रसन्नता से फूल उठा । हाई-स्कूल की चौथी कक्षा को एक घण्टे पहिले छुट्टी देकर जब वह अध्यापक घर पहुँचा तो सबसे पद़िले उसने अपना ट्रक खोला और सुद्दासिनी के चित्र को भाँखों लगा, हृदय से चिपका लिया । न्याय अनिल इसी अवस्था में कुछ अपने को भूला बेठा रद्दा । सुख का यह प्रवाह उसके लिए अपने वेग में एक घकका लेकर भाया था । अब जब उसने सुद्दासिनी को पाया था तो उस पाने में वदद अपने को खो बेठा । सम्मुख दीवारगीर पर रखी टाइम-पीस टिक-टिक करतो मिनिट प्र मिनिट माइती रददी । वे भूत के काले गर्त में गिर अपना वेयक्तिक अस्तित्व विलोन करते रहे । अनिल अपने कमरे में पर उससे बहुत दूर बेठा रद्दा । केले के व्रूक्षों के बीच जब उसने सब प्रथम सुद्दासिनी को देखा था बह क्षण उसे स्मरण भाया । वद्द क्षण व्यापक होकर उसके समस्त जीवन को ढक लेगा इसकी कत्पना उस समय कौन कर सकता था तब सुद्दासिनी साधारण कन्या थी । सुन्दरी वह थो । पर केवल सुन्दरी दी थी । इसके अतिरिक्त नबयुवा अनिल के लिए वद्द और कुछ न थी । उसने तीन दिन इसी प्रकार उसे क्षपने मौसी-पति के उद्यान में देखा, और चौथे दिन पाया कि वद्द उसी स्थान पर एक पहर से बाहर बेठा उसके आगमन की प्रतीक्षा करता रद्दा है । उसके भौतर इन तीन दिनों में कुछ कल-पुर्ज॑नवीन दिशा में घूम गये । श्५




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