नवजीवन | Navajeevan

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Navajeevan by रामचन्द्र तिवारी - Ramchandra Tiwari

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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शिवकुमार जाकर उसके गलें से चिपट गया । शिवकुमार की श्रवस्था चार वर्ष की थी । वैजंती को उस समय कुछ श्रच्छा न लग रहा था । वह श्रपने से, घर से, सारी सृष्टि से असन्तुष्ट थी । रामसरन के कष्ट नें उसके संसार में महान्‌ परिवर्तन कर दिया था । शिवकुमार की यह क्रीडा उसे वहूत भाती थी, पर झ्राज मानसिक स्थिति भिन्न होने के कारण उसे श्रच्छी न लगी । उसने बालक को फछ्िटक दिया बहु संमल न पाया श्रौर भूमि पर जा पडा । माँ के पास जाकर शिकायत की--“चाची ने मारा है ।”” सहदेई की स्थिति वही थी जो साधारख जन की होती है । वैजंती के पति के कारण परिवार पर यह्‌ विपत्ति राई है । पत्नी यदि पति के पुण्य फलो में भ्राधे की म्रधिकारिसी है तो अपराध में भ्रद्ध-दराड-भागी क्यो नहीं ? इसलिए जब से यह समस्या खडी हुई हैं, सहदेई, वैजंती पर क्रुद्ध हो रही हैं । इसीके कारण यह सब हुप्रा । इसीका झभाग परिवार के लिए घातक वचर बन गया । चटक्कर बोलो-- क्यों री .. !” श्र इसके भ्रागे जैसे उसका वाक्य अपने ही बल से मुंह में रुक गया । वैजंती ने सहदेई के भ्रयृखं वाक्य में कुछ पाया, जिस पर उसे विश्वास न हुआ । उसने शीश उठाकर जेंठानी के मुख की श्रोर देखा रौर फिर उसका हृदय घक से हो गया । वह समझती थी कि परिवार की प्रतिष्ठा की वेंदी पर वह बलिदान हैं, इससे उसका स्थान महत्त्वपूर्ण होना चाहिए । पति पिता की प्रतिष्ठा के निमित्त कारागार-निवासी वना है रौर पिता अकेले उसी के तो नहीं हैं, सव के हँ ! जो उसने किया वह सब के लिए । उसका समस्त भार भुगतना पड़ेगा उसे । वह प्रसन्नता, से गर्वभरी, उसे सहन करने को प्रस्तुत थी । उसके कारख शिवकुमार इस प्रकार गिरा, इससे उसमें पश्चात्ताप का छंद्य हुआ था । सोच रहीं थी कि इतना श्रपने दुःख में लो जाना क्या ~ १६ ऋ




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