श्रावक का अस्तेय - व्रत | Shrawak Ka Astey Vrat
श्रेणी : जैन धर्म / Jain Dharm

[adinserter block="2"]
Add Infomation AboutShankar Prasad Dixit
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
2 MB
कुल पष्ठ :
70
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
No Information available about शंकर प्रसाद दीक्षित - Shankar Prasad Dixit
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)११ विपयारम्भ
उसने, पश्चात्ताप किया श्र इंसा को छोड़ने के साथ ही चोर को
भी छोड़ दिया ।
मतलब यह, कि जय तक कोई स्वयं चोरी करता है, तब तक
वद्द दूसरे को दण्ड कैसे दे सकता है ? दूसरे से, किसी बात
का पालन करवाने के लिये, पहले स्वयं उसका पालन करना
्त्यावश्यक है । छाप स्वयं थी चोरी करे, और दूसरे को चोरी
के ही लिए दरड दें, यह न्याय नहीं कहला सकता ।
जीवधारियों की चोरी भी, द्रन्य की चोरी में शामिल है ।
किसी जीवधघारी पर॒ उसकी स्वयं की, या वह बेसमक है, तो
उसके अभिभावक-स्वामी ादि की, श्ाज्ञा के बिना अपना अधि-
कार करना, उसके द्वारा किसी रूप में लाभ उठाना, चोरी है ।
जैसे पशु, पक्षी, स््री, बालक, आदि को विना उनके स्वामी की
आज्ञा के झपने 'झधिकार में करना, उन्हे बेंचकर या दूसरी
तरदद उनसे फायरा उठाना, चोरी है ।
द्रव्यनवोरो के ऐसे ही श्ौर भी कई माग है, जिनका वर्णन
यहां विस्तार भय से नहीं किया जाता है ।
किसी के घर, बाग, खेत, मागे,; गाँव, देश या राज्य पर
बिना उसकी 'झान्ना के अधिकार करना, अपने काम में लेना या'
किसी प्रकार का फायदा उठाना, क्षेत्र की 'वोरी है । झपने वैभव
User Reviews
No Reviews | Add Yours...