श्रावक का अस्तेय - व्रत | Shrawak Ka Astey Vrat

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Shrawak Ka Astey Vrat by शंकर प्रसाद दीक्षित - Shankar Prasad Dixit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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११ विपयारम्भ उसने, पश्चात्ताप किया श्र इंसा को छोड़ने के साथ ही चोर को भी छोड़ दिया । मतलब यह, कि जय तक कोई स्वयं चोरी करता है, तब तक वद्द दूसरे को दण्ड कैसे दे सकता है ? दूसरे से, किसी बात का पालन करवाने के लिये, पहले स्वयं उसका पालन करना ्त्यावश्यक है । छाप स्वयं थी चोरी करे, और दूसरे को चोरी के ही लिए दरड दें, यह न्याय नहीं कहला सकता । जीवधारियों की चोरी भी, द्रन्य की चोरी में शामिल है । किसी जीवधघारी पर॒ उसकी स्वयं की, या वह बेसमक है, तो उसके अभिभावक-स्वामी ादि की, श्ाज्ञा के बिना अपना अधि- कार करना, उसके द्वारा किसी रूप में लाभ उठाना, चोरी है । जैसे पशु, पक्षी, स््री, बालक, आदि को विना उनके स्वामी की आज्ञा के झपने 'झधिकार में करना, उन्हे बेंचकर या दूसरी तरदद उनसे फायरा उठाना, चोरी है । द्रव्यनवोरो के ऐसे ही श्ौर भी कई माग है, जिनका वर्णन यहां विस्तार भय से नहीं किया जाता है । किसी के घर, बाग, खेत, मागे,; गाँव, देश या राज्य पर बिना उसकी 'झान्ना के अधिकार करना, अपने काम में लेना या' किसी प्रकार का फायदा उठाना, क्षेत्र की 'वोरी है । झपने वैभव




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