जैन दर्शन और आधुनिक विज्ञान | Jain Darshan Or Aadhunik Vigyan

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Jain Darshan Or Aadhunik Vigyan by मुनि नगराज - Muni Nagrajसोहनलाल बाफणा - Sohanlal Bafana

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सोहनलाल बाफणा - Sohanlal Bafana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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श्‌ स्पाहाद श्रौर सापेक्षवाद स्याद्वाद भारतीय दर्दानों की एक संयोजक कड़ी श्रीर जैन दर्दान का हृदय है । इसके बीज श्राज से सदस्रों वर्ष पूर्व संभापित जैन श्रागमों में उत्पाद, व्यय, घ्रौव्य; स्यादस्ति स्यान्नास्ति ; द्रव्य, गुण्ण, पर्याय; सप्त-नय श्रादि विविव रूपों में विखरे पड़े हैं । सिद्धटसेन, समन्तभद्र श्रादि जैन-दार्थानिकों ने सप्त भंगी श्रादि के रूप में ताकिक पद्धति से स्याद्ाद को एक व्यवस्थित रूप दिया । तदनन्तर श्रनेंकों श्राचायों ने इस 'पर अगाघ वाजड़मय रचा जो श्राज भी उसके सैरव का परित्वय देता टै ! दियत १५०० चर्पों में स्याद्वाद दादनिक जगत का एक सजीव पहलू रहा श्ौर श्राज भी है। सापेक्षवाद वैज्ञानिक जगत में वीसवीं सदी की एक मह्ानु देन समभा जाता है । इसके श्राविप्कर्ता सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो० भ्रलवर्ट श्राइस्टीन हैं जो पादचात्य देशों में सर्वसम्मति से संसार के सबसे श्रधघिक दिमागी पुरुप माने गये हैं । सन्‌ १९०४ में आ्ाईस्टीन ने सीमित सपिक्षता' शीर्पक एक निवन्ध लिखा जो “भौतिक छास्त्र का चर्प पत्र (०४४ 900८) नामक जर्मनी पश्चिका में प्रकाधित हुआ । इस निवन्व ने वैज्ञानिक जगत में श्रजीव हलचल मचा दी थी । सन्‌ १९१६ के वाद उन्होंने श्रपने सिद्धान्त को व्यापक रूप दिया जिसका नाम था--'श्रसीम सापेक्षता । सन्‌ १९२१ में उन्हें इसी खोज के उपलब्ष में भौतिक विज्ञान का 'नोवेल' पुरस्कार मिला । सचमुच ही श्राईस्टीन का भ्रपेक्षावाद विज्ञान के शान्त समृद्र में एक ज्वार था । उसने विज्ञान की बहुत सी वद्धमूल घार्शाओं पर प्रहार कर एक नया मानदण्ड स्थापित किया । श्रपेक्षावाद के मान्यता में श्राते ही न्यूटन के काल से घाक जमाकर वैठें हुए शुद्त्वा- कर्पण (1.८१ 0 फ्रत्धर्शप्थिधिंणा) का सिंहासन डोल उठा । 'ईथर' (6७6) नाम- दोष होने से वाल वाल ही वच पाया व देदा-काल की घारणाओं ने भी एक नया रूप ग्रहण किया । श्रस्तु; बहुत सारे विरोधों के पश्चात श्रपनी गणित सिद्धता के कारण झाज वह श्रपेक्षावाद निविवादतया एक नया श्राविष्कार मान लिया गया है । इस प्रकार दार्यनिक क्षेत्र में समुदुभूत स्याद्ाद श्रौर वैज्ञानिक जगत में नवोदित सापेक्षवाद का तुलनात्मक- विवेचन प्रस्तुत निवन्ध का विषय है ।




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