जैन कहानियां १४ | Jain Khaniyan 14

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Jain Khaniyan 14 by महेंद्र कुमार - Mahendra Kumarमुनि नगराज - Muni Nagrajसोहनलाल बाफणा - Sohanlal Bafana

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१ सह लमट्ल कौलाम्बी मे महस्रमल्ल नामक एक वणिक्‌-पुत्र रहता था । वह दुर्गुणो का पिण्डथा | दूसरो को ठगने, झूठ बोलने व चोरी करने में बहुत कुशल था । वह नाना भाषाएं जानता था और नाना वेष बनाने में भी सिद्धहस्त था | धूतंता मे भी वह अग्रणी था । रत्नसार नामक रत्नो का एक व्यापारी भी कौशाम्बी में रहता था । धूतं सहस्रमल्ल वणिक्‌ के वेष मे एक दिन रत्नसार की दृकान पर आया । रत्नों के बारे मे पूछताछ की । आक्वति से वह एक भला बनिया लगता था, अत रत्नसार ने उसे वहुमुल्य रत्न दिख- लाये । सहस्नमलल उन्हें देखकर तृप्त नही हो पाया । उसने और भी बहुत सारे रत्न देखने चाहे । रत्नसार कुछ लोभ मे आ गया । उसने सोचा, भ्राज अच्छा ग्राहक पकड में आया है। सहीनोमे विकने वाला




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