स्थितप्रज्ञ - दर्शन | Sthitapragy - Darshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१५ १५५ कामना और जीवनाभिलाषा छूटने पर अब शारीर बाकी रहा सो, केवल उपकारार्ध । “'निमंमो निरहकार ' पद से यही भाव सुचित किया है [हे १५६ पूर्वॉक्त भावनावस्था और क्रियावस्था से भिन्न स्थित-प्रज्ञ की यह ज्ञानावस्था बिल्कुल अवर्णनीय १५७ भावावस्था में समगता है १५८ क्रियावस्था में विवेक है १५९ तीनों अवस्थाएँ मिलाकर स्थित-प्रज्ञ की एक ही अखण्ड वृत्ति सोलहवा व्याख्यान श४६-१५५ [१] १६० स्थित-प्रज की तिहेरी अवस्था के मूल में ईव्वर का विविध स्वरूप १६१ ईव्वर का पहला रूप कंवल कुभ १६२ दूसरा विश्वरूप १६३ तीसरा दुभाशुभ से परे ब्रह्म-सज्ञित १६४ गीता की परिभाषा में 'सतू', “सदसत्‌' 'न सत्‌ नासत' १६५ तक से सदसत्‌ की चार कोटिया हो सकती है । इनमें तीन ही ईश्वर पर चरिताथें ( २] १६६ ईश्वर के और तदनसार स्थितप्रज्ञ के जीवन का यह विविध स्वरूप “ज्ञान-यज्ञेन चाप्यन्ये' ब्लोक मे सूचित १६७ इसीका और अधिक स्पष्टीकरण १६८ बाह्य जीवनाकार मे भेद दिखाई देने पर भी सभी स्थितप्रज्ञो को तीनो अवस्थाओ का अनुभव होता है [दे] १९६९ ये अवस्थाएँ परस्पर-सम्बद्ध, परस्पर उपकारक ही है




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