श्री प्रवचनसार - परमागम | Shri Pravachanasar - Paramagam
श्रेणी : धार्मिक / Religious

[adinserter block="2"]
लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
4 MB
कुल पष्ठ :
242
श्रेणी :
यदि इस पुस्तक की जानकारी में कोई त्रुटि है या फिर आपको इस पुस्तक से सम्बंधित कोई भी सुझाव अथवा शिकायत है तो उसे यहाँ दर्ज कर सकते हैं
लेखक के बारे में अधिक जानकारी :
पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)उस: अर
न्स्न्
€+-
बाग
टस्ग ५ ।००+कटे
पीडिका न.
. सो पराभृचको भूतबलि पुप्परद, - हा )
दोयमुनिकों सुगुरुन पढ़ाया । ः
तास अनुसार, पर्टसंडके सूत्रको दे )
. बांधिके पुस्तकॉंमें मदाया ॥ ४६, ॥
फिर तिसी सूत्रको, और मुनिद्टन्द पढि; : «
रची विस्तारसों तावु टीका ।
,धवल महाधवल जयघवल आादिक सु |
सिद्धान्तदूत्तान्तपरमान ठीका ॥ *. 4
, लिन दि सिद्धांतको, नेमिचंद्रादि- ं
जआाचाये, अभ्यास करिंके पुनीता । ं
रचे गीमइसारादि बहु शाख्र यदद ं
कं प्रथमसिद्धांत-उत्तपत्ति-गीता ॥ ४७ ॥
दोहा । .
जीव करम संजोगसे, जो संसति परजाय । दी |
* तामुं सुगुरु विस्तार करि, इहां रूप दरसाथ ॥ ४८ | ै
शुनथानक रु मा्गना, वरनन कीन्ह दयाल ।
भविजनके उद्घारको, यह मग सुखद विशाज [४९]
कवित्त छर्द। ( ३१ मात्रा ?
मीयार्थिक नय मधान कर, यहां कथन कीन्हों गुरदेव ।
यादीकी अद्ुद्धदव्यार्थिक, नय कहियत है यों उखि लेव (|
१ युश्पदन्त । न की नल जले
User Reviews
No Reviews | Add Yours...