पत्रकार - कला | Patrakaar Kala

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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[ पश्रकार-क़ा जोर पत्रकारहै। अपने विरोधियों के बार, ंधिकारियों के प्रहार, कानून, की योटें और जपने दी आईमियों बी सख्तियाँ झेलनी पड़ती हैं। यंह ओ है सो तो है ही, इंस के अलावा, यहाँ पर शिक्षा का इतना अधिक अभाव है और स्ाचारपत्रों की महत्ता से लोग इतना अधिक अपरिचित हैं; कि किसी पत्र को निकाल कर व्यापारिक दृष्टि से चला सकना तक कठिन होता है, भर ऐसी दशा में पत्र- सश्चालक के ठिए थह' कड़िन हो जाता है कि चह अपने पत्रकारों को उचित पुरस्कार दे सके, जिसका परिणाम. यह होता हैं कि यहाँ के पड्कारों की आयु इतनी कम होती है कि आर्थिक सूट से उन्हें कभी छुटकारा ही नहीं मिलता और कभी-कभी तो नौबत थहाँ तक आती है छिं उन्हें अपना भरण पोषण करना तक अस- म्मघ दो जाता है। ऐसी दूशा में इस टेढ़े, पेचीदे माग में कदम रखने के छिए फिस को सलाह दी जाय ? यह काम तो,--फम-से-कम इस समय, उन्हीं लोगों के फरने का है जिन में कोई विदोष अन्त दाह हो जो उन्हें चेन न लेने देता हो, जिन के हृदयों में एक अटूट लगन हो, जिस के सामने थे आय-व्यय को शिनते ही न हों, जिन में त्याग, भोर सहिष्णुता की चह प्रज्वलित भावना हो कि बड़े-से बड़े कष्ट ओर बड़ी-से-बड़ी हानियाँ भी तुच्छ दिखलाई पड़तों हों, और जो छोक-सेवा के महत्तम आदर्श पर लो लगाए. हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद ओर मात्सय से दूर, निर्विकार चिस से निदिष्टि स्थानकी ओर दूढ़ता-पूवेक आगे बढ़ना दी अपने लीवनका पक मात्र उद्देश बना चुके हों । ऐसे ही लोग इस काम के फात्र नह




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