मेरी जीवन यात्रा | Meri Jeevan Yatra

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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कुटुम्य-पात हरे साख थी भोर वह जवतक रहे तमतक धन-पान्य से भरेपूरे रहे। उनका यह स्वमाव-सा हो गया था रि थोड़ा-वहुत मुनाफा मिलता तभी वह भाल बैच देते, ज्यादा लोम में न पड़ते ! चनका झफोम का धन्धा था । सेतों से अफीम के रस के घड़े-के-पड़े भरकर भाते । कुछ दिनों रसे रहने के वाद उस रस को बड़ी-वड़ी परातों में मया जाता भ्ौर फिर लदइ जैसे गोले बनाए जाते । इसे श्रफीम की गोटियाँ कहते थे । कोठों में लाधों की श्रफीम भरी रहती थी । कहावत है कि लोभ गला कटता है। पिताजी के बाद भर के लोगों को प्राय: घाटा ही उठाना पड़ा, पयोक्ति वे उनकी नीति के अमुसार नहीं चले । थोड़े नफे में सन्तोप मानवेवाले को जोसम कम उठानी पढ़ती है मौर वह लाभ में ही रहता है । उनके जीवन में कुटुम्ब की स्थिति सभी दृष्टि से प्रच्छी रही । विवाहू के बाद जब में ससुराल जानें लगी तब पिताजी ने कहा था-- “बेटी, तू पराये घर जा रही है। वहाँ अच्छी तरह रहना । ज्पादा न बोलगा । कोई चार वार कहे तो एक थार वोलना । जैसा उनका जीवन भव्य रहा वैसी हो उनकी मृद्यु भी । जिस दिन उनका स्वगंवास हुमा, उस दिन सुबह वह मदिर गये; ग्यारहें बजे तक चिट्ठियाँ लिखते रहे । फिर नहाकर धोती पहन रहे थे कि उनको चक्कर आ गया । कमरे में झापे और लेट गए । लोग इकट्ठे हो गए । डाक्टरों को बुलाया गया । इन्दौर से भी डानटर युलाये गए, पर कुछ भी फायदा ने हुआ । शाम को सातें बजे उनका देहान्त हुआ । कहते हैं, उनका प्राण ब्रह्माण्ड में से निकला । सिर ऊपर से फट गया था भौर खुन गिरा । ऐसी मृत्यु किसी थोड़ी या महापुरुप की होती हैं, ऐसा कहा जाता है । उस समय मेरी भायु दस-ग्यारह साल की थी




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