शरत साहित्य | Sharat Sahitya (xiii-xiv)

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Sharat Sahitya (xiii-xiv) by नाथूराम प्रेमी - Nathuram Premi

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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अधिकार की श्द उचित समझा, वैसा ही जवाब दे दिया । बोला, “' हूँुनेपर मिल सकता दै,, मगर इतने किरायेपर ऐसा मकान मिलना सुद्किल है ।?? अपूर्वने फिर कोई बात नहीं की, दरवानके पीछे पीछे कुछ दूर '्वलकर वह एक ब्राय्य पोस्ट आफिसमें पहुँचा । मद्रासी तार-बाबू उस समय टिफिनके लिए, गये थे । घंटेमर बेठेनेके बाद जब उनके देन हुए तब घडीकी ओर देखकर उन्होंने फरमाया, “ आर छुट्टीका दिन है, ऑफिस तो दो दी बजे बन्द हो चुका, अब तो दो बचके पन्द्रद मिनट दो रहे हैं | ”” अपूर्वने अत्यन्त नाराजीके साथ कहा, “ यह कसूर आपका है, मेरा नहीं । मैं घंटे-मरसे इन्तजार कर रहा हूँ । ” उस आदमीने भपूर्वके चेहरेकी तरफ देखकर बिना किसी सकोन्वके कहा, “' नहीं, मैं सिर्फ दस मिनट यहाँ नहीं था । ” अपू॑ने उसके साथ काफी झगड़ा किया, झूठा कहके उसका तिरस्कार किया, रिपोटे करनेका डर दिखाया, मगर कुछ नहीं हुआ । वह निर्विकार चित्तसे अपना रजिस्टर और कागलात दुरुस्त करने लगा । उसने लवाब तक देनेकी जरूरत नददीं समझी । अब समय नष्ट करना व्यर्थ समझकर अपूर्व भूख-प्यास, और क्रोधसे जलता-सुनता बड़े टेछिप्राफ आफिसमें पहुँचा | वहीं भीड़मेंसे किसी कदर भीतर घुतकर जब बहुत देर बाद अपने नि्विज्न पहुँचनेका समाचार माको मेज सका, तब दिन छुपनेमें ज्यादा देर न थी ) दुःखके साथी दरवानने अने की, “* साहब, मुझे भी बहुत दूर जाना है |”? अपूर्व बहुत ही परेशान और अन्यमनस्क हो रहा था,--छुद्दी देनेमें उसने कोई आपत्ति नहीं की । उसे मरोसा था कि नम्बस्वाठी सड़कें सीघी और समान होनेसे मकान हूँद लेनेमें कोई दिक्कत न होगी । दरवान अन्यत्र चला गया, और वद्द पैदठ चलता हुआ तथा अपनी सड़कका हिसाब छगाता हुआ अन्तमें अपने मकानके सामने आ पहुँचा । ड सीढ़ीपर कदम रखते ही उसने देखा कि दुर्मैजिठेके अपने दरवाजेपर खडे हुए तिवारी-मद्दाराज अपनी लाठी ठॉक रदे हैं और अनर्गल बक रहे हैं; उधर तिर्मजिलेसे प्रतिपक्षका एक व्यक्ति पतद्टून पहने खुले बदन अपने कोठेकी खिड़कीके सामने खढा हुआ दिन्दी और रगरेजीमें उसका जवाब दे रह्ा है, और वीत्च-वीचमें घोड़ेके चाहुकसे सौंय-सौंय आवान कर रहा है । तिवारी उसे नीचे




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