धर्म - वीर सुदर्शन | Dharm Veer Sudarshan

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
3 MB
कुल पष्ठ :
130
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)उपक्रमस्नेह-सूरति था ट्वेष, क्लेश का लेशमात्र था नाम नहीं ।
स्वप्न-लोक में भी कगडे-टटे का था कुछ काम नही ॥।
दीनो की सेवा करने में निश दिन तत्पर रहता था ।
नर-सेवा में नारायण-सेवा का तत्व समभक्तता था ॥।
भुला भटका दुखी दीन जब कभी द्वार पर आता था ।
आश्वासन सत्कार-पूर्ण ससनेह यथोचित पाता था ॥
यौवन की आधी में भी वह सदाचार का पक्का था ।
निज पत्नी के सिवा शुद्ध मन ब्रह्मच्े में सच्चा था ॥।
बाल्य-काल मे श्रावक-ब्रत के नियम गुरू से धारे थे ।
धारे क्या, अनुभव के बल निज अन्तमंघ्य उतारे थे ॥।
न्याय-मार्ग से द्रव्य कमा कर न्याय-मार्ग मे देता था ।
सकुद्चल जीवन-नेय्या अपनी भव-सागर मे खेता था ॥।भाग्य-योग से गुह-पत्नी भी थी “मनोरमा' शीलवती ।
प्राणनाथ पति की छाया की भाँति निरन्तर अनुवर्ती ॥।
दासी दास कुटु्म्ब सभी नित रहते थे आज्ञाकारी |
बोला करती थी अति ही मृदु वाणी सब जन-प्रियकारी ॥।
देश, धर्म, जन-सेवा में नित पति का हाथ बंँटाती थी ।
क्लेश, द्वूष, मात्सयं, रूढ़ि के निकट नही क्षण जाती थी ।॥।
गृह-कार्यों में चतुर सुविदुषी देश काल का रखती ज्ञान ।
पर पुरुषों को अन्तर्-मति में पिता वन्धु-सम देती मान ॥।
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