धर्म - वीर सुदर्शन | Dharm Veer Sudarshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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उपक्रम स्नेह-सूरति था ट्वेष, क्लेश का लेशमात्र था नाम नहीं । स्वप्न-लोक में भी कगडे-टटे का था कुछ काम नही ॥। दीनो की सेवा करने में निश दिन तत्पर रहता था । नर-सेवा में नारायण-सेवा का तत्व समभक्तता था ॥। भुला भटका दुखी दीन जब कभी द्वार पर आता था । आश्वासन सत्कार-पूर्ण ससनेह यथोचित पाता था ॥ यौवन की आधी में भी वह सदाचार का पक्का था । निज पत्नी के सिवा शुद्ध मन ब्रह्मच्े में सच्चा था ॥। बाल्य-काल मे श्रावक-ब्रत के नियम गुरू से धारे थे । धारे क्या, अनुभव के बल निज अन्तमंघ्य उतारे थे ॥। न्याय-मार्ग से द्रव्य कमा कर न्याय-मार्ग मे देता था । सकुद्चल जीवन-नेय्या अपनी भव-सागर मे खेता था ॥। भाग्य-योग से गुह-पत्नी भी थी “मनोरमा' शीलवती । प्राणनाथ पति की छाया की भाँति निरन्तर अनुवर्ती ॥। दासी दास कुटु्म्ब सभी नित रहते थे आज्ञाकारी | बोला करती थी अति ही मृदु वाणी सब जन-प्रियकारी ॥। देश, धर्म, जन-सेवा में नित पति का हाथ बंँटाती थी । क्लेश, द्वूष, मात्सयं, रूढ़ि के निकट नही क्षण जाती थी ।॥। गृह-कार्यों में चतुर सुविदुषी देश काल का रखती ज्ञान । पर पुरुषों को अन्तर्‌-मति में पिता वन्धु-सम देती मान ॥।




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