अकबरी दरबार भाग - 3 | Akabari Darabar Bhag - 3

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लेखक :
Book Language
हिंदी | Hindi
पुस्तक का साइज :
28 MB
कुल पष्ठ :
401
श्रेणी :
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश
(Click to expand)[. रे५ |
'सम्भक कर यही निश्चय किया है कि दक्षिण की चढ़ाइ पर या तो
तुम जाद्यों और या मैं जाई । इसके अतिरिक्त और किसी प्रकार
काम में न सफलता हो सकती हे ओर न होगी । यदि तुम
जाओगे तो विश्वास है कि शाहजादा तुम्हारे कहने के बाहर या
विरुद्ध न जायगा । जब तक तुम वहाँ रहोगे, वह किसी दूसरे से
परामश या मन्त्रणा न करेगा और कम साहसवाले, अदूरदर्शी
च्और अअयोग्य व्यक्तियों की बातें न सुनेगा । इसलिये उचित यही
है कि तुम पहली तारीख को अपने रहने आदि का सामान
पहले से भेज दो और आठवीं तारीख को तुम चले जाओ ।
सेवक ने यह निवेदन कर दिया है कि बकरियों ओर भेड़ें या
तो बलिदान के काम आती हैं और या मांस पकाने के लिये ।
दूसरा क्या उपयोग हो सकता है ? जब श्रीमान् की ऐसी आज्ञा
है, तब मुझे उसमें कोई आपत्ति नहीं है ।'--
सिनू १००७ हि० में शेख को यह आज्ञा हुइ कि सुलतान
मुराद को अपने साथ ले आओ । साथ ही यह भी आज्ञा हुई
कि यदि दक्षिण पर चढ़ाई करनेवाले अमीर उस देश की
रक्षा का भार ढें तो शाहजादे के साथ चले आओ । ओर नहीं
तो शाहजादे को भेज दो ओर स्वयं वहीं रहो । आपस में एका
रखो और सब लोगों से ताकीद कर दो कि मिरजा शाहरुख की
अधीनता मे रहें ।
सिरजा को भी झंडा ओर नक्कारा देकर मालवे की
गोरे भेज दिया जहाँ उसकी जागीर थी । उसके भेजने का
उद्देश्य यह था कि वह वहाँ जाकर सेना का अ्रबन्ध करे और
जब दक्षिण में बुलादट दो, तब तुरन्त वहाँ पहुँच जाय |
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