अर्थविज्ञान और व्याकरण दर्शन | Arthvigyan Aur Vyakaarandarshan

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( ६ ) कोमुदी श्रादि, नागेशंभटकृत वैयाकरणुसिद्धान्तमंजूषा, लघुमंजूपा, शब्देन्दुशेखर, परिभी- पेन्दुशेखर, महाभाष्य की उद्योत टीका तथा स्फोटवाद आदि, कौरडभट्ट विरचित वैयाकरण- भूषण, मणडन मिश्र कृत स्फोटसिद्धि, वामन जयादित्य कृत काशिका श्रादि प्रंयों में अथविज्ञान विषय के श्रंग श्रौर उपांगों का विशेष विस्तार से विचार किया गया है । दाश निक विद्वानों ने जिन श्रमर कृतियों में श्रथविज्ञान का विवेचन किया है, तथा जिन श्रन्थरकों का विशेष सदुपयोग किया गया है, उनके नाम श्रादि सद्दायक अन्थों की सूची में विशेषरूप से दिये गए हैं | वैयाकरणों का दृष्टिकोणु--इस निबन्ध में वैयाकरणों के इस सिद्धांत को समुचित तर ग्राह्म समका है कि “'सर्ववेदपारिषदं हीद॑ शास्त्रमू-तत्र नैकः पन्‍्था: शक्‍्य श्रास्थातुम्‌”” (मद्दाभाष्य २, १, श८) व्याकरण सारे वेदों, समस्त दशनों श्रादि का पथप्रदर्शक है, श्रतः किसी एक माग-विशेष (दर्शन-विशेष, धर्म-विशेष; सम्प्रदाय-विशेष) का आशय नहीं लिया जा सकता है । वैयाकरणों को श्रतरव चतुमखी उत्तरदायित्व के मध्य में झ्रपना उत्तरदायित्व सुचारुरूप से निभाना होता है । वैयाकरणों ने इस समस्त उत्तरदायित्व को एक संक्षिप्त नियम में पूरा कर दिया है । वैयाकरणों का दृढ़ मन्तव्य है कि सारे सुखों का मूल, समस्त विवादों; वित्रहों और दुखों का परिद्दार एक समन्वयवाद है । प्रत्येक शब्द में प्रत्येक अ्रणु श्रौर परमाणु में स्फोट श्र ध्वनि का समन्वय है, प्रकृति श्रौर प्रत्यय का समन्वय है । इसी समन्वय के श्राघार पर प्रत्येक अथ,; प्रत्येक सृष्टि का कार्य चलता है। जहाँ पर दोनों में से एक की उपेक्षा की जाती है, वहीं से वादविवाद, विरोध, संघर्ष प्रारम्भ दो जाता है । श्रतः वैयाकरण कहते हैं कि :2-- न केवला प्रकृतिः प्रयोक्तब्या, नापि केवलः प्रत्यय। । ने केवल प्रकृति का प्रयोग करना चाहिए श्रौर न केवल प्रत्यय का, न केवल प्रकृति वाद का प्रयोग करना चाहिए श्रौर न केवल प्रत्ययवाद का, न केवल भ्रीतिकवाद का प्रचार श्रौर व्यवहार करना चाहिए श्रौर न केवल श्रध्यात्मवाद श्रौर विज्ञानवाद का ) न केवल ज्ञाननमार्ग का ही प्रयोग करना चाहिए. श्रौर न केवल कर्ममाग का । दोनों का समन्वय करके ही प्रत्येक वाद, प्रत्येक सिद्धान्त श्र प्रत्येक मन्तब्य का प्रयोग करना श्राद्ि; जैसा कि सरल श्र पुन्दर शब्दों में इसके समन्वय का प्रकार भगवान्‌ कृष्ण ने गीता में प्रतिपीदित किया है । व्याकरण श्र वैयाकरणों को जो सन्मान सब श्रोर से प्राप्त हुश्रा है, उसका कारण उनकी निलेपता, निष्पक्षता और सत्यता है । इस सत्यता के कारण ही व्याकरण नीरस होते हुए भी सब से श्रधिक सरस है, अप्रिद्न होते हुए भी सर्वप्रिय है, निवार्य दोते हुए भी झनिवार्य है, व्याकरण होते हुए भी दशन एवं साहित्य है, ध्वनि होते हुए भी स्फोट. है. झभिषा होते हुए भी व्यंजना है, वाच्याथे होते हुए भी व्यंग्याथ-प्रघान ,है, ज्ञान होते हुए भी शेय है, साधन होते हुए भी साध्य है, अषिद्ध होते हुए भी सिद्ध है । व्याकरण ही ५, देखो गीता अध्याय २ से ५. ल्




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