मानस - पीयूष भाग - 3 | Manas Peeyus Bhag - 3

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Book Image : मानस - पीयूष भाग - 3  - Manas Peeyus Bhag - 3
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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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१४ 3दो० चो० और प्र कुमार्गगामी के बल चुद्धि आादिका नाश देप(१०),३०१ कुयोगिनां सुदुलेगं ४ छ्लन्द १०, ४५८कुयोगी 3 श कुररी २१ (३), ३३४ कूटस्थ १४ (रन४), १४४ केकसी १७ (३), २८४ केवल४ छ्द ६, ४८ क्या रावण विरोधी भक्त था... २३ (६); २६२-२६४ खरदूपणु-युद्ध और रावण-युद्धका मिलान२१ (१), र्८-२४६खरदूपणादिकों वरदान २० छंद ४, २४५ चोभपूर्ण आत्मनिंदा ३७ (४-६); रेप ० गायत्री जपसे लाभ दो० १८, २३३2» के वाद जल फेंकनेका प्रभाव ;; ड गुण १७ (२); देर छन्द १, २०४, ३४३ गुणकथन वियोगश्थ्ज्लारकी एक अवस्था३० (६-१३), ३३१गुण-प्रेरक देर छंद १; ३४३-३४४ सुमानी,; गुनानी १७ (१४); २१८-र२० गुदभक्तिके .ग्रन्थ दो० २५, २६६ गुरके लक्षण मं० स्ो० १ सें, ६ » लच्णॉका वर्णन केवल अरण्यकांडमें श्लो० १, ६ गढ़ सं० सो० ६-१० गोचर १४ (३), १४४, १४६ गोपर रर छन्द २; २४४५ गोविन्दजे है 33 गोस्वामीजी कट्टर सर्यादावादी थे... दो० ३३; ३५४५ +». अर ब्राह्मण जाति दो० ३३, २४५५-३४५६ :» . और नारि जातिका आदर्श १७(४-६),२४ (४-११), दो? इृ८, ९०४-२०८,३१७-३१८,३२४,दे८७ » . के छुछ वे थे हुए शब्द १६ (२-४); र३४ क. का लोक व्यवहार परिचय. ३७ (४-६), रेप० ४. की सावधघानता न७ (३), रूपा 2; की शैली १७ (50; र्‌०७ » रसॉका रूपान्तर श्न्तमें भक्ति या शान्त रसमें ही करते हैं २० छन्द (४-७), रा ज्ञान क्‍या है १४ (७), १६३, १६४,१६६-१ ६८दो० चो० और प्रछठज्ञान और संतके लच्ण १४ (७-८), १६५ ज्ञानका परिपाक भक्तिमें होना उसका फज है११ (१६), १९०ज्ञान और भक्तिका सेद जान लेनेसे भगवानके चरणसें अधिच्छिन्न अनुराग दो० १६, २०४ ज्ञान-विज्ञान १६ (३), १८१ ज्ञानाहंकार ४३ (६), ४०६.ज्ञानियों के पीछे भी माया लगती है. ४३ (६); ४१० घनिए्ट प्रेमसूचक लीलायें ओटठसे होती हैं. १०(१३),१०३ चतुमुज तथा भरुजचारीके भाव. देर (१); ३४१-३४९चरण और चरणकमलका भेद... दे४ (१०), ३५६. चरणचिह्न ३० (१८), ३३३-३३४ 'चरणुपंकज १६ (६, १६५६. चरखोंमें लपटना प्रेमविह्वलतासे ३४ (5), दे४६ चराचरका दुखी होना (उदाहरण) २६ (६9, ३१४ चरितद्वारा उपदेश ३७ (४-६), ३८० “चले” से नये प्रसंगका आरंभ ३७ (१, ३७८ चिदाभास १४ (देन्छ), १४४ चुनीती दो? १७, परचौपाई संख्यासे मागका नाप ३ (४), ३५ जड़ और बुध मं० सो०, १०,११ जगाना; जागना १० (१७), १०४-१०६ जगदूगुरु (राम) गुद्ध ४ छंद ६, ४४-४८जदायु रासचरणुचिह्नका स्मरण करते थे ३०(१८); ३३३ जदायुकी आयु १६. (१४), दे १६. जगवतूके नाना रूपॉंको अज्ञानका श्रम कहना ठीकनहीं ३६ (८-६), देजर जगत्‌को सिथ्या कदनेका भाव 15 जड़पदार्थोमें जीवत्व ७ (४-४), पं जनकसुता दो० २३, ३० (२); २६६, ३२४ जयन्तके परीक्षा लेनेका कारण... ? (३-४), रै८-१६.3». को चार प्रकारका दंड (शरणके पूव) २(४); र५ ,,. प्रसंग-द्वारा सुरमुनिकों ढारस दो० २, देर 3». ४ में सवों रसॉकी भलक 2»... दर जय राम'से प्रारम्भ दोनेवाली स्तुति ३९ छंद १, २४४ जानकी ः ३० (७), ३२६




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