मानस - पियूष | Manas - Piyush

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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৫788)पति देवता ( पत्ति ही इष्टदेवहे ) दो० २३७, ३8३ पतिव्रता का पति ही देवता हे ३३४ (४) पत्नी कब पति के दक्षिण और कब वाम दिशा में बैठे३२४ (४),पु... | ইহ (২) .पद्रज (बहो का) भिरोधायं किया जाता है २८२ (३), » की बार बार शिरोधाये करना ३०८ (१) `पदिकहार १९९ (६), ८९-९० ' 'परछुन (परिदन) दो० श४८, दो० ३१७ परत पाँवड़े और देत पाँवढ़े में भेद ३२० (८)परधम का त्याग आपस रूपी कारण के हटते ही करनाचाहिए २८४७ , ६)परम हित (जिससे श्रीरासजी की प्राप्ति या भक्ति हो) ३१७ (६) . परम तत्व ३७० (६), परशुरामजी दोनों हाथों से युद्ध करने में समथ( सब्यसाची ) थे २६८ (८) परशुरामजी ५ कल्लाके अवतार थे २८४ (८) ¦ , ;9 पवनवेगी दै, मनोवेगसे चलते है २६८ (२)ओर लचमणजीके वीररस स्वरूपका मिलानर६८ (८) मरीचि ऋषिके शिष्य . शिवजीके शिष्य २६६ (८), २७१ (५) 9». का अवतार उदंड क्षत्रियोके संहाराथं २७२ (७) ১) ১) क्षत्रियकुल्कके खंहारको प्रतिज्ञा २०२(८),२७०६(२) एक्कीस बार क्षत्र संहार २७२ (७) कदयपको पृथ्वीका दान २७६ (२) निवास स्थान महेन्द्राचल और उसका कारण29 39 ¦ 99 4)` 9 59ছল (ই)से जनकपुर कितनी देरमें आये २६८ (२)939 . 1) 1738 ११ प्रसन्नराधव, हनु० जा० तथा सानसका क्रम एक १घनुष-यज्ञ-मण्डपर्मे ही आगमनको सुचारुता ॐ১১ 9১ केरानेका कारण २९० (५); २६८ (२), २८५ (४-७), ५७८४ के भाइयों और माताका নাল २७६ (२) माता-पितासे उण होनेकी क्था ` ॐ ` 2११ 399: 9१ 3१9 93 ११ ५9२६६ (ण).श्रागमन रामायणम विवाहके बाद्‌ मागमे २६८८२) `नवगुणोका नाश ॒दो० २६६, २७० (३) इत्यादि | पुन्य पुरुषंपरशुरामो नचगुणोकी पराति२८९ (४-७) 9; 9, पिताका वरदान २७६ (२) 55 5১ জলা किससे मिला २६६ (८)9 » अचीक आदि द्वारा क्षत्र संहारसे निद्नत्त होनेका डपदेश २७६ (४)ने क्षत्र संहार किया तव रघुवंशी; निमिवंशी तथा अनेक राजा कैसे बच रहे २८३ (-४), २७६८४)9 +; शामः नाम कैसे पाया २६६ (प) 9 के गवंहरणमे क्या श्प्रगस्मताः दोष है २८५ (४-७) 5 संवाद ओर गीता» स्एतिमें घमेरथके संपूर्ण अंग रण (७) „ स्तुति श्रौर रोहिणी नक्षत्र ४ परिः उपसं दो० ३३६ पाँय पुनीत ३७० (२) पाँवढ़ेका उल्लेख ५ बार : शेश्८ (२) पाँवड़े देत, पाँवड़े पढ़तमें भेद ॥ पाक दैत्य, पाकरिषु ३४७ (३) पाट महिषी २२४ (१) पाणि रहण ३२४ चुन्द ३ पारना १९६ (८), २०० (७), म& पावन षग २०५ (२), १२३-१२४ দ্বিগুন पाँच प्रकारका होता है २९१ (७) पितर २५५ (७); ५२३ पिनाक नामका कारण २७१ (७) पीत वल वीरोका बाना है २१९ (३.४), २४४ (१-२) २४२; ४५२ पीताम्बर भगवानूक्ा नाम श्रौर प्रिय २०९ (२), १५६ पुत्रका अथं १८६ (१); ४ पुत्रहीन मनुभ्य $ ॐएुत्रे्टि यच्च कं खा १८६ (६-७), & ». एक वर्ष तक रावण से निर्विष्न केसे हुआ ,, ৭০ » के हविष्यकी बॉटमें मतभेद. १६० (१-४), १३-३४पुनि-शब्द (भिना अथक); ( = पश्चत्‌ ) २० (३), २६६ (६), ११२पुनीत त, दाल आदि दो° दरम पुनीत प्रीति ` दो० २९६, ३२५ > विप्र दो° ३१२ (४) २६४ (४)




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