संत चरनदास | Sant Charandash

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Sant Charandash by त्रिलोकीनारायण दीक्षित - Trilokinarayan Dikshit

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पुस्तक का मशीन अनुवादित एक अंश

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( १०. ) पांचरात्र साहित्य में अहम, जीवन, जगत्‌ तथा मायादि के स्वरूप का विश्लेषण हुभ्मा है। इसमें ईश्वर के उभय रूपों--निगुण एवं सगुण का विश्लेषण एवं प्रतिपादन हुआ है । जीव के सम्भन्ध में उल्लेख है कि वह झ्रनादि चिरानंदघन तथा ब्रह्म प्रेरित है । यह जीव ब्रह्म निग्रह शक्तिमाया के कारण भ्रम में पड़ जाता है । वह ब्रह्म की शक्ति से ही पुनः मुक्ति प्रास करता है । पांचरात्र साहित्य में वाह्म सात्वत विधियों से श्रचना करने का आदेश है श्र इसके साथ दी साधक को ब्रह्म की शरण में जाने था प्रपत्ति माग पर श्रग्रसर होने का श्रादेश दिये गये हैं । शरणागति के भी घट प्रकार हैं 2 (क) अनुकूलस्य संकल्पः --इश्वर से झनुकूल होने का दृढ़ निश्चय (ख) प्रतिकूलस्य वज नम्‌ --इंश्वर के प्रतिकूल वस्तुश्यों का परिहार (ग) रक्षिष्यतीति विश्वासः --ईश्वर के रक्नकत्व पर शटल विश्वास (घ) गोपप्तृत्व बरणमू . --प्रमुकारेक्षक मानकर (ड) श्ात्मनिक्षेपः --श्ात्म समपंण (च) कार्पस्यम -दैन्य भाव पांचराज्र साहित्य में मोक्ष-तत्व भी विवेचित है । इसके झअन्तगत मोक्ष का झथ हे--“ब्रह्ममावापत्ते” झपुनर्भवता ।” ब्रह्म की कृपा से सभी के साथ एकात्मकता संस्थापित दो जाना दी मोक्ष है । नारद्पांचरात्र भक्ति--भक्ति के मार्ग में देवनारद कृत मक्ति-सूत्रों का व्यापक तथा अत्यन्त उच्छृष्ट मददत्व है । भक्ति सम्प्रदाय की प्रत्येक जड़ इन सूत्रों के मघुर रस से सिंचित तथा पोषित है । भक्ति की क्षेत्र यात्रा, रूपरेखा, श्रावश्यक तत्व, घातक तत्व, श्रेष्ठता झादि का सविस्तार उल्लेख किया गया है (स्वरूप की भक्ति सूत्र, ३) । भक्ति को प्राप्त भक्त समस्त मनोधिचारों से रहित होकर झ्ात्माराम हो जाता है (सूत्र ६) । भक्ति की वास्तविक स्थिति है प्रभुत्वाकरण में अत्यन्त आछकुलता की विद्यमानता (बद्दी, १६) । भक्ति कम तथा ज्ञान से भी श्रष्ठतर है (वही, सूत्र-र४) । ब्रह्म की झअनुकंपा तथा सज्जनों की झपा से प्रेमामक्ति उपलब्ध होती है ( वही, सूत्र--रेप८ ) | भक्त के लिए कुतंगति त्याज्य है (वही, सूत्र ४ ३) । ग्यारह प्रकार की आरसक्तियों में भक्ति श्रेष्ठ है ( वही, सूत्र-८२ ) । इन समस्त विंवेचनों को ृष्टि में रखकर यह स्पष्ट हो लाता है कि पांचरात्र-मत को इस बात का श्रेय सम्प्राप्त है कि उसने भक्ति के उन्नयन में झाशातीत सहायता प्रदान की । पुराणों में भक्ति का स्वरूप--भक्ति-सूत्र के सदश ही पुराण भी भक्ति भावना के श्रमुल्य मखि, सुडदू स्तम्भ तथा कल्याणकारी तत्वों से सुखम्पन्न है । मानव जीवन के लिए, पीयूष-वर्षी जिन तत्वों को वेदों ने गढ़ बनाये रखा उन्हें पुराणों ने




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